समाज में कई कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक अभियान ब्रिटिशकालिन है। २०० वर्ष पूर्व में भी बालिका भ्रूणहत्या हत्या समाज पर एक कलंक समान था, जिसे मिटाने के लिए समाज सुधारकों ने काफी प्रयास किया था। समाज शास्त्र के ऐतिहासिक पन्नों पर नजर डाले तो बालिका भ्रूण हत्या की प्रथा उच्च वर्ग के बंगालियों व राजपूतों में सर्वाधिक प्रचलित थी, जोकि बेटियों अथवा महिलाओं को आर्थिक बोझ मानते थे। भारतीय समाज की सोच में सुधार लाने के क्रम स्पष्ट उल्लेख मिलता है। 1795 व 1804 के बंगाल रेगुलेशन एक्ट ने बालिका शिशु की हत्या को अवैध घोषित किया और 1870 में बालिका शिशु हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक अधिनियम भी पारित किया गया था। इस अधिनियम के द्वारा माता-पिता द्वारा सभी बच्चों के जन्म का पंजीकरण कराना अनिवार्य बना दिया गया और बालिका शिशु के सन्दर्भ में जन्म के बाद के कुछ वर्षों तक भी निगरानी रखने की व्यवस्था थी। इसे वैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से लागू किया गया, जहाँ यह प्रथा अधिक प्रचलन में थी।
राजपूत एवम् बंगाली समाज बेटियों को मानता था आर्थिक बोझ.!
