Headlines

परदेशी’ त…..ना ‘घर’ के, ना ‘घाट’ के, ‘गांव’ में ‘बिरना मौसी’ क ‘बेटवा’, खुश हयेंनि ‘दोनां चाट’ के.!!

परदेशी लोगन क बड़ी इज्जत अऊर सम्मान होत रहा लेकिन जमाना के साथ बहुत कुछू बदली गवा…अब त बचा-खूचा ‘कोरोना’ मसकता. हालत ई बा ‘चौहद्दीलाल’ कि हम अऊर तू ईंहा परेशान हईअ, गावटी ‘चहेटुआ’ ऊहां मजा मारता. ईंहा ‘परदेश’ में ऐतना संघर्ष भवा तब कईसऊ दुकानदौरी-ठेला सजा, लड़िका-लाई पढ़ईअ लगेनि. सही मानअ त गांव परदेश होई गवा, मोका-झोका बड़ी मुश्किल से पहुंचात रहा. अब ‘कोरोना’ के महामारी में आर्थिक बेमारी जकड़ी लिहेसी. मकान-दुकान क केराया-मेंटनेन्स ‘बिजूली’ क ‘बिल’ कपारे नाचता. लड़िकन क फीस अऊर किताब-काॅपी बिना हजारों-लाखों कहां से आयेअ.? गांव वाले ‘छपकोरिआ लाल’ क घंटी टनटना ता, ओ बेचारू ईहीं बम्बई में कईसऊ रेक्शा-टंम्पू हांकी के रोज कुआं खोदी पानी पीअत रहेंनि..कहत हयेंनि कि ई ‘कोरोना’ भूखमरी पर खड़ा कई दिहेअ बा. ट्रेन बंद न होतईअ त गांव जाईके खेतेअ क गेहूं कटाई करीत.

खैर..का किहा जाईअ अब कूछू सूझत नाहीं बा. ‘मिसिर’ ओहर परेशान हयेंनि, ओनकर बड़वार कारोबार रहा. अऊर कुलि भाड़ा-केराया कपारे लदअ ता. दूई-चाठी मजदूर रखेअ रहेंनि कि साल भरेअ क सीजन अप्रैल-मई आवता, सोचेअ रहेंनि गर्मी में धंधा चमके लेकिन ‘कोरोना’ त बड़े-बड़े के चमकाई दिहेसी. एक बात बा कि जवन गांव वाले भईआ-भईआ कईके फोन करअई अऊर भऊजी से घंटन बतिआई के कूछू जुआड़-पानी सेट करअई, अब ओऊ नाहीं घंटी बजावत हयेंनि. भऊजी गुस्सानिं हयेंनि, कहत हयेंनि कि दहिजरआ क नतिये रचिके ईंहा दुख-दर्द फंसा त हाल-समाचार भी नाहीं ले थयेनिं. ‘बिरना मौसी’ क ‘बेटवनूं’ बड़ा तकलीफ में रहेंनि त ‘बेटवा-बिटिया’ के बिआहे कर्जा लिहेअ रहेनिं त अब मोबाइल क घंटी बजता नाहीं ऊठावत हयेंनि..गांव में भल बा ‘खेत-किआरी’ अऊर कोटा क गेहूं-चावल मिलता सब छानी के मस्त हयेंनि. परधानेअ से नेतागिरी में कूछू खर्चा-बर्चा भी वो लहावत रहअ थेनिं. फिलहाल चाय खतम होतईअ फिरी ‘पाड़े’ कहेंनि…परदेशी’ त…..ना ‘घर’ के, ना ‘घाट’ के, ‘गांव’ में ‘बिरना मौसी’ क ‘बेटवा’, खुश हयेंनि ‘दोनां चाट’ के.!!

नोट – खलिहर बैठे परदेशियों की यह आपसी चाय चर्चा है, कलमकार ने व्यंग्यात्मक पीरोने का प्रयास किया है। इसमें अपना कर्मठ चेहरा दर्पणित ना करें..✍️

Leave a Reply

Discover more from सशक्त समाज न्यूज़

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading