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समाज, स्वाभिमान की दुहाई बंद, बेनकाब होगें उत्तर भारतीय नेता.!

मुंबई के प्रवेशद्वार कल्याण में लोकतांत्रिक पर्व जोरदार मनाया जा रहा है। ऐसे में वैचारिक मंडी भी सज चुकी है लेकिन स्थानीय उत्तर भारतीय नेताओं में स्पष्टवादिता का ‘टोटा’ साफ नजर आ रहा है। जहां कुछ युवा कल्याण (पूर्व) में विकास से उदासीन क्षेत्र की उदासीनता सोशल मीडिया के माध्यम से जगजाहिर कर रहे हैं, वहीं कुछ पार्टीवाद की भीड़ में ‘सेल्फी’ सहित राष्ट्रहित का भोंपू बजा रहे हैं। सर्वाधिक चर्चा इन दिनों स्थानीय उत्तर भारतीय समाज को ही लेकर चल रही है।

बताया जा रहा है ७० प्रतिशत से ज्यादा मतदाता उत्तर भारतीय समाज का होनें के बाद भी कल्याण में उत्तर भारतीय नेताओं को यहां कोई पार्टी चुनावी टिकट बड़ी मुश्किल से अब गाहे-बगाहे देती है लेकिन पहले ऐसा नहीं था। फिलहाल ५ वर्षों तक सामाजिक-सांस्कृतिक व धार्मिक आयोजन मंच से सामाजिक एकतावाद की दुहाई देकर खुद को स्वयंभू नेता सिद्ध करने वाले स्वार्थवश मौन हैं। हमेशा समाजहित कार्यों की शपथ उठाने वाले नेताजी ही समाज की एकता-अखंडता व स्वाभिमान की दुहाई देना बंद कर चुके हैं। व्यापारी किस्म के कुछ उत्तर भारतीय नेताओं की भी अपनी पीड़ा है क्योंकि वे सत्तादल से यदि ना लटके रहें तो उनके भवन निर्माण सहित विभिन्न फैक्ट्रियों के कारोबार पर इसका असर पड़ेगा। ऐसे में समाज-स्वाभिमान से दूरी बना रहे हैं। उत्तर भारतीय समाज के अधिकांश युवाओं ने इस चुनाव में भी समाज-स्वाभिमान फर्स्ट का नारा बुलंद कर दिया है। फिर अधिकांश उत्तर भारतीय नेताओं का उत्तर भारतीय उम्मीदवार से मोहभंग होता देख युवा स्वयं को छला महसूस कर रहे हैं। कुछ बुजुर्ग समाजसेवी व धर्मवीरों को तो युवाओं ने संदेश भी दे दिया है कि इस चुनाव में विश्वासघात पीछे नहीं बल्कि सामनें से खुलकर कीजिये। इन तथ्यों से साफ नजर आ रहा है कि चुनाव के बाद कई स्थानीय उत्तर भारतीयों के विश्वासघात का करारा झटका उन्हें लग सकता है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी मानना है कि जब इन उत्तर भारतीय नेताओं की कर्मकुंडली का पर्दाफाश होता है या राजनीतिक स्वार्थ होता है, तब समाज की दुहाई का भोंपू बजने लगता है। अब इनके विश्वासघात को उत्तर भारतीय युवा देख रहे हैं तो ‘भोंपू’ की सुनवाई शायद इस चुनाव के बाद कहीं ना हो।

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