हमारे भारत देश में एक स्वस्थ लोकतंत्र है, जिसके सर्वश्रेष्ठ जीवंत स्तंभ हैं और तीन स्तंभों की आपसी जंग से जब सकारात्मक निचोड़ नहीं निकलता है तब सर्वश्रेष्ठ मुखिया न्यायपालिका के निर्णय व सुझाव का पालन किया जाता है। न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायका, मीडिया यही चार मुख्य स्तंभ हैं। जगजाहिर तथ्य व लेख में स्पष्ट लिखा है कि सरकार भी बिना मीडिया अधूरी है और मीडिया के बिना सरकार. देश की ‘समस्याओं’ की ‘पोटली’ अख़बार टीवी के आलावा अब डिजिटल मीडिया व सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार तक पहुंचती है. देखा जाए, तो मीडिया की भूमिका जनप्रतिनिधि की होती है. विद्वानों द्वारा लोकतांत्रिक लेखों में स्पष्ट लिखा है। देश में सभी परियोजनाओं को जनता तक पहुंचाने का काम कार्यपालिका का होता है, विधायिका का काम जनता के लिए उन योजनाओं को बनाना होता है. देश में कानून-व्यवस्था और एक स्वस्थ लोकतंत्र के निर्माण के लिए न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. मीडिया का काम एक Watchdog की तरह होता है. कहीं भी गड़बड़ी होती है, उसे तुरंत प्रकाश में लाता है. कभी-कभी न्यायपालिका भी सरकार के कामों पर कमेंट या सवाल उठाती है, जिसे Judicial Activism कहते हैं. विधायिका और कार्यपालिका तो एक-दूसरे के पूरक होते ही हैं. मीडिया और सरकार के बीच के रिश्ते हमेशा अच्छे नहीं हो सकते, क्योंकि मीडिया का काम ही है सरकारी कामकाज पर नज़र रखना. लेकिन वह सरकार को लोगों की समस्याओं, उनकी भावनाओं और उनकी मांगों से भी अवगत कराने का काम करता है और यह मौक़ा उपलब्ध कराता है कि सरकार जनभावनाओं के अनुरूप काम करे.
विधायकजी पढ़िये…’मीडिया’ का काम ‘Watchdog’ की तरह.!
