सरकार और नागरिक का रिश्ता बड़ा ही नाज़ुक होता है। विश्वास का भी होता है और अविश्वास का भी। समर्थन का भी होता है और विरोध का भी। मांग का भी होता है और इनकार का भी। आप एक नागरिक के तौर पर जब भी कभी कहीं धरना-प्रदर्शन देखते हैं तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होती होगी। मुझे ठीक-ठीक तो नहीं मालूम मगर कई लोग मिलते हैं जो इनसे सहानुभूति रखते हैं। कई लोग मिलते हैं जो इनका मजाक भी उड़ाते हैं। लोकतंत्र में मतदान करना और चुनाव के बाद सरकार बना लेने भर से एक नागरिक का लोकतांत्रिक कर्तव्य समाप्त नहीं हो जाता है। उसका असली संघर्ष सरकार बनने के बाद शुरू होता है जब वह अपनी मांगों को लेकर सरकार के सामने अपनी दावेदारी करता है। कई प्रदर्शन इस आस में समाप्त हो जाते हैं कि काश कोई पत्रकार आएगा और हमारी तस्वीर दिखाएगा। कई प्रदर्शन इस बात की चिन्ता ही नहीं करते हैं। उन्हें पता है कि जब वे प्रदर्शन करेंगे तो कैमरे वाले आएंगे ही आएंगे। कांग्रेस और बीजेपी के प्रदर्शनों को बाकी प्रदर्शनों से ज्यादा सौभाग्य प्राप्त है। रघुपति राघव राजा राम, उनको बुद्धि दे भगवान…जरूरी नहीं कि गांधी की प्रतिमा के सामने धरना-प्रदर्शन किया जाए तो ‘रघुपति राघव राजा राम’ ही गाया जाए। गांधी इस भजन को अलग संदर्भ में गाते थे। राजनीति ने इसके बोल भी बदल दिए। सनमति की जगह बुद्धि का इस्तेमाल होने लगा। भाजपा सांसद संसद परिसर के भीतर बनी गांधी प्रतिमा के सामने प्रदर्शन कर रहे थे। मांग कर रहे थे कि इटली की अदालत में जिन लोगों ने पैसा खाया, देश की जनता जानना चाहती है कि घूस किसने ली है। यह जनता के सामने आएगा। भाजपा की सरकार है फिर भी वे प्रदर्शन कर रहे हैं। एक बार लगा कि कहीं वे मांग तो नहीं कर रहे हैं कि घूस लेने वाले का नाम बताओ, मगर यहां हुई बातों से लगा कि वे आश्वासन भी दे रहे हैं कि घूस लेने वालों का नाम देश की जनता के सामने आएगा।.
May 06, 2016 21:55 रवीश कुमार ( एनडीटीवी)


