सुनील तिवारी..✒️
राज्य के मुखिया ‘योगी आदित्यनाथ महराज जी’ को हमारे ‘काशी-प्रयाग मध्य’ में सर्वदलीय नेता पूजते हैं. कुछ स्वार्थ में, तो कुछ मायावी बजट तलाश में, तो कुछ भगवाधारी धर्म सम्मान में..।
गौरतलब है कि काशी-प्रयाग मध्य की भूमि पर जन्में अधिकांश जनमानस सदैव सामाजिक-धार्मिक भूमिका में तत्पर रहते हैं। ऐसे में यदि हमारे छोटे से जिले की ‘फुलवारी’ को ‘बागवान’ ही ‘छलनी’ करेंगे तो ‘दुख’ होना ‘लाजिमी’ है। वैसे कसूरवार भदोहीवासी जनमानस ही हैं क्योंकि ‘योगीजी-मोदीजी’ के नाम पर विधायक भी ‘चून’ दिया है। भाजपा के कुछ विधायकों की दशा ऐ है कि चंद राजनीतिक-कुटिनीतिक लोगों की गैंग बनाकर नीजी व्यापारिक प्रतिष्ठान को गौरवान्वित कर रहे हैं लेकिन सार्वजनिक विकास को ‘चूना’ लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं। क्षमा कीजियेगा..लोकतंत्र की विधा को हमनें इससे पहले भी देखा है..कई सरकार भी आई और गई..लेकिन नौकरशाहों एवम् विधायकों में इतना गरूर नहीं था। मुख्यतः इसका भी श्रेय ‘योगी महराज’ को ही जाता है…इससे पहले विपक्ष की भूमिका में ‘योगीजी’ आप दहाड़ते थे तो सरकार हिल जाती थी और अपने कर्तव्यों के निर्वहन में हिचकते नहीं थे। जगजाहिर है कि सलाखों तक सत्ता असुरों ने कबड्डी खेली लेकिन फर्ज-धर्म बतौर ध्वजवाहकों का नेतृत्व झंडा आपने सदैव बुलंद रखा। खैर..15 वर्षों की पत्रकारिता में हमनें भी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (सदस्य) होने की भूमिका को कभी डगमगाने नहीं दिया। खैर..’मातृभूमि सेवा’ बतौर विधायकगण ‘विधायक पद’ की पगार सहित विभिन्न भत्ता करीबन २ लाख प्रति महीनें लेते हैं, जिसके बाद भी ‘विधायक नीधि’ विकास कार्य में ‘कमीशनखोरी’ के सर्वोच्च आरोपों से घिरे हैं। फिलहाल पारदर्शिता जरूरी है और हमनें आज तक किसी भी राजनेता या शासनिक-प्रशासनिक अधिकारियों से चवन्नी की अपेक्षा नहीं रखा क्योंकि हमें धार्मिक पथमय पता है कि (मातृभूमि मँइया) के विकास हेतु मिलने वाली सरकारी धनराशि में कमीशनखोरी करने वाले ‘पापी महल’ भले बना लें लेकिन उक्त महल में आज नहीं तो कल पापफल (अशांति) फैलना लाजमी है। धार्मिक-सामाजिक मंथन यह भी है कि सार्वजनिक विकास धनराशि की घपलेबाजी पर चंद कौड़ियों की खातिर या स्वार्थवश जो स्थानीय नेता-समाजसेवी या धर्मधारी मौन रहते हैं, ‘मातृभूमि मँइया’ सहित जनमानस को रही असुविधाओं की ‘पीड़ात्मक आह’ उन्हें भी झेलनी ही पड़ेगी। खैर..हद तो तब हो जाती है कि वर्षों पत्रकारिता उपरांत जब कलमकार उत्तर प्रदेश की खुशहाली हेतु कम से कम अपने गांव-समाज या जनपद में भ्रष्टाचार मुक्त विकास की अपेक्षा हेतु लेखनी बुलंद करते हैं तो खादी-खाकी का मेल हो जाता है। यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि स्वार्थी-अधर्मी भ्रष्टाचारियों की कोई विशेष जाति नहीं होती है। यह एक सफेद पोशाक ‘सिंडिकेट’ होता है, जो कमीशन-रिश्वत की मंडी का लंका दहन होते देख बौखलाहट में अपने पद का दुरुपयोग शुरू कर देता है। शायद पद के दुरुपयोग के समय कुर्सीधारी अपना ‘संविधानिक शपथ’ भी भूल जाते हैं। यदि राज्य के मुखिया योगी आदित्यनाथ महराज के हाथों सत्ता की डोर है तो भ्रष्टाचारियों के सर्वनाश हेतु गुहार लगना लाजिमी है। अंतत: स्पष्ट है कि भ्रष्टाचारियों की मंडी में बौखलाहट मची है लेकिन लगता है कि ‘योगी धाम’ से पटखनी पूर्व इनका मनोबल नहीं टूटेगा।
मातृभूमि मंथन (02) – पढ़ियेगा जरूर..
भदोही विकास हेतु ‘योगीजी का तोहफा’, १५ करोड़ पर भ्रष्टाचारियों की गिद्ध नजर.?


