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परदेशी’ त…..ना ‘घर’ के, ना ‘घाट’ के, ‘गांव’ में ‘बिरना मौसी’ क ‘बेटवा’, खुश हयेंनि ‘दोनां चाट’ के.!!

परदेशी लोगन क बड़ी इज्जत अऊर सम्मान होत रहा लेकिन जमाना के साथ बहुत कुछू बदली गवा…अब त बचा-खूचा ‘कोरोना’ मसकता. हालत ई बा ‘चौहद्दीलाल’ कि हम अऊर तू ईंहा परेशान हईअ, गावटी ‘चहेटुआ’ ऊहां मजा मारता. ईंहा ‘परदेश’ में ऐतना संघर्ष भवा तब कईसऊ दुकानदौरी-ठेला सजा, लड़िका-लाई पढ़ईअ लगेनि. सही मानअ त गांव परदेश…

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धूम्रपान सामग्री पहुंचे, भले हो लाॅकडाउन…

दिल को खटके,                    जरा हटके…         💘💘💘💘💘 लॉकडाउन में दरवाजा, खिड़की भी है बंद समाजसेवी बने व्यापारी, धंधा खातिर चंद धंधा खातिर चंद, बिन ‘पास’ वाहन दौड़ाते मंडी से ‘अन्नदान’ बटोर, रिश्तेदारी पहुंचाते हे ‘बहुरुपीय’ करें, सेवा ‘दूर-दराज’ जाऊन धूम्रपान सामग्री पहुंचे, भले हो लाॅकडाउन एस. टी. ‘बहुरूपीय’…

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‘परदेशी’ तो ‘हेहर’ हैं भाईसाहब, चंदा देकर ‘मानवता’ पथ चलते रहेगें.!!😀

कोरोना की महामारी में सबसे ज्यादा त्रस्त शहर बैठे परदेशी हैं, वही परदेशी जो खून-पसीने की कमाई से गांव-समाज को सींचते रहते हैं। गांव-समाज के कुछ लोग भी उन्हें ‘बकरा’ समझकर ‘हलाल’ करने में पीछे नहीं रहते हैं। आखिर पीछे रहें भी क्यों.? जब बकरा हलाल होने आया है तो….फिर भी एक परदेशी गांव-समाज के…

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महल में बैठे नेताजी, कोरोना का बढ़ा रसूख..

दिल को खटके,                    जरा हटके…         💘💘💘💘💘 शासन लीन’ योजना में, पुलिस करती अमल दिहाड़ियों की पीड़ा’, खाकी हरती आजकल खाकी हरती’ आजकल, लाॅकडाऊन में भूख महल में बैठे नेताजी, कोरोना’ का बढ़ा रसूख हें ‘बहुरूपीय’ मौन, कब कोटा पे पहुंचे राशन क्षेत्रवासी हैं देख रहें, आपदा में…

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नीजी ‘धन’ लेकर, ‘क्षेत्र’ में आखिर ‘ना’ आये..

दिल को खटके,                    जरा हटके…         💘💘💘💘💘 पालक हैं जनता के, मालिक ‘नीधि’ फंड गलियों से लापता हुये, करोड़ो हुआ झंड करोड़ो हुआ झंड, राजनीति ‘पथ’ कमाये नीजी धन लेकर, क्षेत्र में आखिर ना आये कहें ‘बहुरूपीय’ मौन, राजनीति संचालक कोरोना से त्राहि-त्राहि, भूमिगत हैं पालक एस. टी….

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