परदेशी’ त…..ना ‘घर’ के, ना ‘घाट’ के, ‘गांव’ में ‘बिरना मौसी’ क ‘बेटवा’, खुश हयेंनि ‘दोनां चाट’ के.!!
परदेशी लोगन क बड़ी इज्जत अऊर सम्मान होत रहा लेकिन जमाना के साथ बहुत कुछू बदली गवा…अब त बचा-खूचा ‘कोरोना’ मसकता. हालत ई बा ‘चौहद्दीलाल’ कि हम अऊर तू ईंहा परेशान हईअ, गावटी ‘चहेटुआ’ ऊहां मजा मारता. ईंहा ‘परदेश’ में ऐतना संघर्ष भवा तब कईसऊ दुकानदौरी-ठेला सजा, लड़िका-लाई पढ़ईअ लगेनि. सही मानअ त गांव परदेश…


