कोरोना की महामारी में सबसे ज्यादा त्रस्त शहर बैठे परदेशी हैं, वही परदेशी जो खून-पसीने की कमाई से गांव-समाज को सींचते रहते हैं। गांव-समाज के कुछ लोग भी उन्हें ‘बकरा’ समझकर ‘हलाल’ करने में पीछे नहीं रहते हैं। आखिर पीछे रहें भी क्यों.? जब बकरा हलाल होने आया है तो….फिर भी एक परदेशी गांव-समाज के सामाजिक-धार्मिक कार्यों में अपनी नीजी व व्यापारिक समस्याओं का दर्दनाक घूंट पीते हुये जन्मभूमि के प्रति समर्पित रहने हेतु प्रयासरत रहता है। ऐसे में कसूरवार भी परदेशी ही हैं भाईसाहब…जब गांव-समाज में कुछ कर्मठ लोग उपस्थित हैं, चंदाखोरी, दलाली, कमीशनखोरी व भ्रष्टाचार समर्पित कर रहे हैं और गांव-समाज खुश है तो परदेशी क्यों हस्तक्षेप करते हैं। गांव-समाज में सामंजस्य बना है और सबका दुकानदौरी चल रहा है तो जन्मभूमि से पलायन करके परदेशी बने लोग गांव-समाज में विकास कार्यों के प्रति अलख क्यों जगा रहें हैं.?
आप ही बताइये कमीशनखोरी-दलाली व भ्रष्टाचारी बंद हो जायेगी तो बिचारे स्थानीय खद्दरधारी बेरोजगार नहीं हो जायेगें.? यदि कर्मठ लोग बेरोजगार हो गये तो विकास लेकर क्या करोगे..वैसे भी गाँव वाले शायद सही कहते हैं कि जब जन्मभूमि से इतना प्रेम था तो पलायन करके भाग क्यों गये..? जन्मभूमि चंदा भेजिये तो विकास कार्य किया जाय। हाँ परधान व कोटेदार जी से विकास कार्य व गेहूं-चावल गांव वालों को मिल रहा है तो परदेशियों को नहीं सुलगना चाहिये, सरकारी योजना है तो लिया जा रहा है…खैर..परदेश में धंधा-पानी चौपट करके और लाॅकडाऊन में फंसे परदेशियों की भले ही गांव-समाज के लोग काल करके खोज खबर ना लें लेकिन परदेशी तो परदेशी हैं और गरीबों की मदद करने के लिये गांव के प्रधान और कोटेदार से सोशल मीडिया पर गुहार लगाकर उन्हें परेशान कर रहे हैं…चौपाल में इतनी ही बतकही चली, तब से ‘पाड़ेजी’ कहेंनि कि हम ‘परदेशी’ तो ‘हेहर’ हैं भाईसाहब साहब, चंदा देकर ‘मानवता’ पथ चलते रहेगें.!!😀😀
नोट – खलिहर पंचाईत को ‘व्यंग्यात्मक लेख’ में पीरोने का प्रयास ‘व्यंग्यकार’ द्वारा किया गया है, इस ‘दर्पण’ में कोई ‘स्वयं’ को ‘निहारनें’ का प्रयास ना करें..हाँ सिर्फ SHARE-Forward करके अन्य पाठकगणों तक पहुंचा दें…✍️


