दिल को खटके, जरा हटके.!!= गेहूँ-चावल बांट चुके हैं, अबकी बंटता आलू
गेहूँ-चावल बांट चुके हैं, अबकी बंटता आलू सियासी जंगमय देखो, ब्राम्हण बहूतई चालू ब्राम्हण बहूतई चालू, प्रधानी पर दांव लगाएं ‘दरीना’ को ‘कुटनीति’ से, अपसई में लड़ाएं कहे ‘बहूरूपीय’ मौन, चप्प रहिए ‘सब’ केहूँ आलूदम खाते रहिए, जल्द बंटे चावल-गेहूँ


