जिला पंचायत चुनाव में परिवारवादी वर्चस्व कायम करने के लिए जहां स्थानीय विधायक व पूर्व मंत्री अपना सर्वस्व दांव पर लगा बैठे हैं, वहीं सियासत में शातिर ‘विजय’ का एक ‘अजय’ राजनैतिक जंग में पीछे नहीं है. जगजाहिर है कि बात भदोही जनपद हो तो अजय शुक्ला पर आपकी नजरें टिक जाएगी. खैर…’विजय’ का ‘अजय’ कहा जाने वाला यह ‘पूर्व छात्र नेता’ व जिला पंचायत सदस्य सियासत में शातिर हो चुका है।
गौरतलब है कि भदोही जनपद की सियासत में अजय शुक्ला एक ऐसा नाम है, जो युवावस्था से ही लड़ाकू किस्म का रहा है. छात्र संघ के अध्यक्ष से जिला पंचायत सदस्य तक भले ही शुरूआती दौर में बाहुबली विधायक विजय मिश्रा का करीबी रहा लेकिन जब पार्टी बदली तो भिड़ंत से कभी पीछे नहीं हटा. जगजाहिर है कि समाजवादी सत्ता की हनक में भी शासनिक-प्रशासनिक दांव खेला गया लेकिन खुलेआम राजनैतिक जंग में बाहुबली विधायक विजय मिश्रा के सामने उन्हीं का ‘अजय’ उनसे जंग लड़ता रहा. पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के कई केंद्रीय नेताओं ने भी बाहुबली विधायक विजय मिश्रा के सामनें इस लड़ाका को उतारने की हरी झंडी दे दी थी लेकिन सियासत में दलबदलुओं की हरियाली नोट के सामनें जिले का समीकरण गया. जैसे ही भदोही विधान सभा सीट बसपाई रविन्द्र नाथ त्रिपाठी ने टिकट हथियानें में कामयाबी हांसिल की, वैसे ही भाजपा ने अन्य सीटों पर ब्राम्हण के बाद सबसे बड़े ‘बिंद समाज’ के वोट बैंक के लिए ज्ञानपुर सीट महेंद्र बिंद के हवाले कर दिया. विश्वस्त सुत्र बतातें हैं कि भाजपा के दिग्गज नेताओं ने भी जातिय समीकरण को मेंटेन करने और बाहुबली विधायक विजय मिश्रा की मदद में यह खेल खेला था. फिलहाल सियासत में शातिर हो चुका अजय शुक्ला फिर छाती तानें खड़ा है और भदोही जनपद में राजनैतिक धर्म निभाते हुए परिवारवादी मंसूबों वाले नेताओं को आपस में भिड़ा चुका है, जिसके बाद भी भाजपा पार्टी यदि इस युवा की सुध ना लें, तो शायद यह उड़न खटोला वाले दलबदलुओं के परिवारवाद की जीत होगी और समर्पित पार्टी लड़ाकों की हार..।



