भारत में तेजी से व्यावसायिक विस्तार कर रहे मुकेश अंबानी के रिलायंस समूह ने पिछले साल मई में चीन की खिलौना उत्पादक कंपनी हैमलेज को 620 करोड़ रूपये में अधिग्रहीत किया था। पिछले सप्ताह ही मध्य प्रदेश के एक हिंदी दैनिक ने अपने व्यापार पृष्ठ पर एक खबर छापी थी जिसका सारांश यह था कि मुकेश अंबानी खिलौनों के कारोबार को बढ़ाने की योजना पर काम कर रहे हैं। इसे आप मात्र संयोग ही समझें कि जब से केंद्र में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार स्थापित हुई है देश के दो बड़े औद्योगिक घरानों ने गजब की तरक्की की है। सरकारी उपक्रमों की खरीद से लेकर अन्य व्यावसायिक प्रसंविदाओं में इन्हीं दो घरानों का वर्चस्व स्पष्ट दिखाई पड़ता है। यह समझना मुश्किल है कि सरकार देश के लिए काम कार रही है या अपने व्यावसायिक मित्रों के लिए.?
सरकार की इस नीति पर वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास की एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी (संपादित अंश) काफी कुछ कहती है। वे लिखते हैं,’हे भारत माता, जियो लांच पर एक पेज के विज्ञापन से आपके राष्ट्र सेवक नरेंद्र मोदी के आशीर्वाद से लेकर प्रधानमंत्री व गूगल प्रमुख की बातचीत में एक और एक ग्यारह इतने हैं कि दुनिया हैरान है कि कैसी हैं भारत माता! बताएं भारत माता, अमेरिकी कंपनियों की ऐसी कृपा अंबानी पर क्यों हुई? दुनिया कोरोना में ठहरी हुई है, कोई फैसले नहीं ले रहा है लेकिन 58 दिनों में अंबानी ने भारत के शेयर बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा 53 हजार करोड़ रुपए का राइट्स इश्यू बेच डाला तो जियो प्लेटफार्म के 24.70 प्रतिशत शेयर दे कर विदेशियों से 1,15,693 करोड़ रुपए का कुबेरी खजाना भी पा लिया तो क्या ईस्ट इंडिया कंपनी का इतिहास दोहराने वाला नहीं है? भारत माता क्या लगता नहीं कि फिर विदेशियों, विदेशियों के एजेंटों से इतिहास दोहरागा। क्या एकाधिकार, मोनोपॉली गुलामी नहीं होती? क्या 138 करोड़ लोगों को वापिस दर्जन भर सेठों की लूट से जीना होगा? लोगों को कितनी तरह की बेड़ियों में लाचार, बेबस और अपने आपको लुटवाने वाला बनवाना है? हे, भारत माता कुछ तो अपने कृपापात्रों को सद्बुधि दीजिए!’
अब आप फिर पिछले हफ्ते की खबर पर लौटिये। इस खबर से 15 महीने पहले सीएनबीसी आवाज की 10 मई 2019 की खबर में यह बताया गया था कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा ब्रिटिश हाई स्ट्रीट आइकन को खरीदने के लिए सहमति जताए जाने के बाद दुनिया की सबसे पुरानी खिलौना रिटेलर कंपनी हैमलेज को चीन से भारतीय नियंत्रण में पारित करने की तैयारी है और इसके लिए हांगकांग में सूचीबद्ध सी बैनर इंटरनेशनल होल्डिंग्स लिमिटेड से 250 साल पुरानी श्रृंखला खरीदने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गये हैं। यह घोषणा होते ही उस दिन हांगकांग शेयर बाजार में सी बैनर के शेयरों की खरीद-फरोख्त निलंबित कर दी गई थी। रिलायंस ने सौदे की कीमत का खुलासा नहीं किया, लेकिन 2018 में, सी बैनर ने हैमलेज से संबंधित सद्भावना और ब्रांड मूल्य में 49.8 मिलियन डॉलर वार्षिक रिपोर्ट में साख की मद में दिखाए थे जिन्हें यह सौदा करते वक्त घटा दिया गया। इस कटौती ने खिलौना रिटेलर का वहन मूल्य 36% घटाकर 626 मिलियन युआन ($ 91.85 मिलियन) कर दिया। चीनी समूह ने 2015 में हैमलेज को फ्रांस के ग्रुप लुडेंडो से 100 मिलियन पाउंड ($ 130.2 मिलियन) में खरीदा था।
आखिर इस सबका उल्लेख करने का अर्थ और प्रयोजन क्या है.? आपके मस्तिष्क में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। बीते रविवार को आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ के 68वें संस्करण का प्रसारण हुआ था। मन की बात कार्यक्रम से जुड़ा यह वीडियो भारतीय जनता पार्टी के यू-ट्यूब चैनल पर रिलीज हुआ है, जिसे अब तक 11 लाख से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है। लेकिन हैरान करने वाली बात तो यह है कि मन की बात कार्यक्रम को जहां 36 हजार लाइक्स मिले हैं तो वहीं इसे करीब 3 लाख से ज्यादा डिसलाइक्स भी मिले हैं। पसंद-नापसंद की इस आंकड़ेबाजी से इतर विमर्श यह है कि करीब साढ़े पांच महीने से अधिक समय बीत गया और देश कोरोना के कारण अब भी तालाबंदी जैसी व्यवस्था से जूझ रहा है। सकल घरेलू उत्पाद दर 23 फीसदी ऋणात्मक है। बेरोजगारी के आंकड़े उफान पर हैं। ऐसे में जब प्रधानसेवक खिलौनों पर प्रबोधन करते हैं तब हमारे जैसे अल्पबुद्धि वाले इस खिलौना पुराण का महात्म्य समझने के लिए विवश होते हैं। देश के अभूतपूर्व प्रधानमंत्री की मन की बात से पांच दिन पहले खबर आती है कि रिलायंस ब्रांड्स के प्रेसिडेंट और सीईओ दर्शन मेहता ने कहा था कि कुछ सालों में हमने भारत में हैमलेज ब्रांड के तहत खिलौनों की रिटेल बिक्री में काफी सफलता हासिल की है और इसे एक लाभप्रद बिजनेस में बदला है।
बड़ी आबादी के बावजूद, भारत का वैश्विक खिलौना बाजार में सिर्फ 0.5 प्रतिशत हिस्सा है। ग्लोबल मार्केट रिसर्च फर्म IMARC का अनुमान है कि भारत का खिलौना बाजार लगभग 10,000 करोड़ रुपये का होगा। इसमें से संगठित खिलौना उद्योग का अनुमान 3,500-4,500 करोड़ रुपये है, और घरेलू खिलौनों का हिस्सा इसका मात्र 12-13 प्रतिशत हैं। असंगठित क्षेत्र बाजार के बड़े हिस्से को नियंत्रित करता है, जिनमें से 90 प्रतिशत खिलौने चीन से आयात किए जाते हैं। खिलौना उद्योग के लिए परेशानी कुछ महीने पहले शुरू हुई थी जब सरकार ने आयात शुल्क 20 से बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दिया था। जिसका असर यह हुआ कि लोगों ने अपने आदेश वापस लेने शुरू कर दिए। विभिन्न शुल्कों में 200 प्रतिशत वृद्धि के कारण कीमतों में बढ़ोतरी हुई, जिससे खिलौने अधिक महंगे हो गए। सरकार का यह सुनिश्चित करने का निर्णय कि सभी आयातित खिलौने भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, ने भी आयातकों को सावधान किया है। बीआईएस मानदंडों के अनुरूप नहीं होने वाले खिलौनों को नष्ट कर दिया जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप आयातकों को नुकसान होगा। निम्न गुणवत्ता वाले खिलौने, असंगठित बाजारों और छोटे शहरों में अपना रास्ता बनाते हैं। चीन में COVID-19 के प्रकोप ने भारत में तालाबंदी से पहले खिलौनों के व्यापार के तरीके को प्रभावित किया। भारत में पहुंचने वाले अधिकांश खिलौने गुआंग्डोंग में निर्मित किए गए हैं, जो कि महामारी केंद्र वुहान से लगभग 1,000 किमी दूर वुहान से हैं। तैयार खिलौनों के अलावा, चीन दूसरे हाथ से बने खिलौने के सांचे का एक बड़ा आपूर्तिकर्ता है, जिसे स्थानीय भारतीय खिलौना निर्माताओं द्वारा भारी रियायती कीमतों पर खरीदा जाता है। विभिन्न खिलौनों और स्टेशनरी वस्तुओं के कुछ हिस्से भी चीन से आते हैं। इसलिए जब हमारे प्रधानसेवक खिलौनों के संदर्भ में स्वदेशी का राग छेड़ते हैं तब सबसे ज्यादा ध्यान इसी खबर पर जाता है। और तब लगता है कि किसी कंपनी का मार्केटिंग मैनेजर भाषण दे रहा है। (लेख साभार – अजय भट्टाचार्य)



