दिल को खटके,
जरा हटके…
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सरकारी ‘ठेका’ लेता, नेताजी का परिवार
सड़क निर्माण हो, या ‘मधुशाला’ की धार
या मधुशाला की धार, देखो ‘बहँक’ रहे हैं
भ्रष्टाचारी ‘घर’ में, सियासत ‘चहक’ रहे हैं
हे ‘बहुरूपीय’ मौन, क्षेत्र विकास हो भारी
नेताजी कुर्सी छोड़े, ठेका लें खूब सरकारी
एस. टी. ‘बहुरूपीय’
(९३२४००६२६९)
आपका व्यंग्यकार, आपकी आवाज..
(स्तंभ वर्ष–१३) – ’जन्मभूमि’ की ‘मिट्टी’ का ‘तिलक’ लगाता हूँ, हाँ…’झूट्ठों की नगरी’ में भी ‘सत्य नारायण’ कथा ‘सुनाता’ हूँ.!


