उत्तर प्रदेश के विभिन्न गांवों से ‘प्रधानजी’ की विदाई का साईत-सुदिन करीबन घोषित हो चुका है. दीपावली में दीपक के ऊँजाले के साथ नई आशाओं की ज्वाला उठेगी. कुछ प्रधान रंगारंग भ्रष्टाचार में ५ साल बिताने के बाद मालामाल हैं और अब खुद ही घर बैठ जाएगें, कुछ आरक्षित-अनारक्षित में खो जाएगें. कुछ तो धीरे-धीरे गंगा-यमुना स्नान करके स्नेह-प्यार का प्रसाद बांट रहे हैं लेकिन फिर भी गांव वाले नाराज हैं. आखिर नाराज भी क्यों ना रहें क्योंकि जब ‘योजनाओं’ का ‘महाप्रसाद भंडारा’ चल रहा था, तब उन्हें हांसिए पर रख दिया गया था. वैसे ‘कीचड़’ में ‘कमल’ खिलता है तो….कई गांवों में ऐसे ‘प्रधान’ या ‘प्रधान के पति’ भी मिलेगें, जिन्होंने गांव में स्कूल, गौशाला, नाली, सड़क चमकाना तो छोड़िए बल्कि बिना घोर कमीशन सैकड़ों आवास, शौचालय-सोखता से गांव के जरूरतमंदों को लाभान्वित करवाकर चमचमां रहे हैं. अब आरजू साफ है कि गांव वाले उन्हें ही फिर से प्रधानी का सेहरा पहनायेगें लेकिन निर्विरोध मुश्किल है कि सेवा का मौका पाएगें. वैसे उन प्रधानों का भी कर्मानुसार सम्मान ग्रामीण कर रहे हैं, जो भ्रष्टाचारी सिद्ध होकर भी गांव का नाम रौशन कर दिए हैं और कई तो जांच से बचने के लिए लुका-छिपी खेल रहे हैं. ऐसे भी कई गांव हैं…जहां पिछड़े वर्ग के ग्राम प्रधान को भ्रष्टाचारी मानते हुए सभ्य गांव वाले डाट-डपट दे रहे हैं लेकिन शिकायत और जांच की फजीहत नहीं पालते क्योंकि उनका मानना है कि प्रधान बिचारे को जाते-जवाते भी अधिकारी जांच के नाम नोंच खाएंगे, जो पांच सालों से गांव के विकास कार्य को झांकने नहीं आए. उपरोक्त चर्चा विभिन्न गांव की गलियों में गूंजलक तो है लेकिन कुछ ‘पंडित-पंडाा’ भी प्रधान के भविष्य की कुंडली विचारनें में जुटे हैं, जो कहते हैं स्वार्थवादी प्रधानजी यदि फुर्सत मिल गई हो तो…गांव के देवी-देवताओं के दरबार की परिक्रमा कर लें. जगजाहिर है कि उन्हीं दरबारों में ‘भोग दंड’ के समय मत्था पटकना है. चंद महीनें बचे हैं तो गांव के मंदिरों पर भी कुछ सेवाभावी कार्य करके जाते-जवाते – ‘पाप’ का ‘प्रायश्चित’ कर लीजिए ‘प्रधानजी’.!!
(यथार्थ व्यंग्य BY एस. टी. ‘बहुरूपीय‘)



