उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में कोरोना संकट के दौरान ‘काली-पीली’ की चर्चा तेज है लेकिन शायद ही इसके पीछे छिपा रहस्य समझा जा सके. एक आकलन के मुताबिक सिर्फ 12सौ रूपये में ‘काली-पीली’ यांनि मुंबई के आॅटो-टैक्सी से यात्री पहुंच रहे हैं।
गौरतलब है कि इस कोरोना संकट के दौरान मुंबई के लाखों आॅटो-टैक्सी चालकों ने लाॅकडाऊन के पहले चरण का पालन तो किया लेकिन दूसरे चरण के मध्य में हजारों के सब्र का बांध टूट गया। उधर लगातार लाखों दिहाड़ी मजदूरों की गांव वापसी जिद्द पर महाराष्ट्र सरकार ट्रेन शुरू करने की मांग केंद्र सरकार से करती रही लेकिन रेलवे ट्रेन की शुरुआत देर-सबेर हुई. जोकि १२सौ यात्री प्रति ट्रेन के साथ रजिस्ट्रेशन वगैरह के निपोरचरखा में उलझन भरी हो गई है। फिलहाल जब मजबूरन यूपी-बिहार सहित विभिन्न राज्यों के मजदूरों ने पैदल मार्च शुरू कर दिया, तब नीजी वाहनों को परमिशन देने की योजना भी शुरू हुई। यहां भी देर हो चुकी थी क्योंकि इसी की आड़ में कुछ ट्रक-टैम्पों मालिक भी प्रवासियों को 2 हजार से 5 हजार प्रति यात्री यूपी-बिहार सेवा शुरू कर दिये। इससे जहां सोशल डिस्टेन्सिंग की धज्जियां उड़ी, वहीं परमिशन सिस्टम भी साईकिल, मोटरसाइकिल, नीजी वाहनों सहित ट्रक-टैम्पों के सामने फेल हो गया। ऐसे में कुछ बुद्धिजीवि वर्ग के लोग भी परमिशन लेकर सवालाखी बस करके, उसमें 35-40 की संख्या में परिवार व गांव वालों सहित रिश्तेदारों के साथ रवाना हो गये। ट्रेन का रजिस्ट्रेशन सिस्टम व सड़क मार्ग का साधन 2 से 5हजार खर्च अधिकांश दिहाड़ी मजदूरों की पकड़ से बाहर रहा।
देखी-देखा पाप, देखी-देखा पुण्य – मुंबई के आॅटो-रिक्शा व टैक्सी चालकों का पहला जत्था सैकड़ो की संख्या में ट्रायल पर परिवार सदस्य या सवारी लेकर १० दिन पूर्व यूपी-बिहार निकला था। ड्राइवरों को गांव जाना ही था और साथी भी मिल गये। इनके गांव पहुंचते ही ‘देखी-देखा पाप, देखी-देखा पुण्य’ की तर्ज पर हजारों आॅटो रिक्शा चालक भी मुंबई से गेयर लगाकर चल पड़े। हालाकि मंजिल दूर थी तो इसमें सैकड़ो दुर्घटना के शिकार भी हुये, दर्जनों घटनाओं में मौत भी। फिलहाल यूपी-बिहार के विभिन्न जिलों में इन दिनों पहुंचे रिक्शा-टैक्सी ‘काली-पीली’ चर्चा बन उभरे हैं।
सीएनजी की मुख्य भूमिका – मुंबई के अधिकांश आॅटो रिक्शा में सीएनजी कीट लगा है, यही सीएनजी यूपी में ‘काली-पीली’ की चर्चा का सुत्रधार है। मुंबई बार्डर पर बसे ‘दहिसर सर्विस स्टेशन’ काशीमिरा के हेड कैशियर दिनेश तिवारी कहते हैं कि हर रात सैकड़ो आॅटो रिक्शा झूंड में सीएनजी भरवाने के साथ १० लीटर पेट्रोल/डीजल लेकर रवाना हो रहे हैं। सीएनजी रास्ते में कुछ दूर नहीं मिलने पर आॅटो में पेट्रोल-डीजल की टंकी पहले से होती है, जो संजीवनी का काम कर रही है। हालांकि आॅटो से लंबी दूरी घातक है और ऐसी यात्रा नहीं करना चाहिए, वहीं पैदल मजदूरों को जाते देख दिल पसीज रहा है।
सिर्फ १२सौ रूपये प्रति यात्री – सीएनजी का रेट ४४/४५ रूपये प्रति किलो है, आॅटो रिक्शा के बाटला में साढ़े ३ से ४ किलो का आता है। ऐसा मुंबई से भदोही के औराई तहसील अंतर्गत कंठीपुर गांव सपरिवार पहुंचे आॅटो चालक-मालक संजय कुमार यादव बताते हैं कि एक बाटला रिफलिंग पर ढ़ाई सौ से ३सौ किलोमीटर आॅटो चला लेकिन रास्ते में मुख्य मार्ग पर सीएनजी की व्यवस्था सिर्फ ३ से ४ जगह ही संभव थी। हालाकि वे २ बार ही रिफलिंग ले पाये यांनि आकलन के तौर पर ५०० किलोमीटर के अलावा करीबन १ हजार किलोमीटर ७९ रूपये प्रति लीटर पेट्रोल पर चले। पेट्रोल पर आॅटो का ऐवरेज प्रति लीटर २० किलोमीटर के आसपास रहा। मुख्यतः ड्राइवर सहित ४ सवारी वाला रिक्शा उन्हें प्रति सवारी १२ सौ के आसपास में पड़ा। यह नीजी व्यवस्था अन्य वाहनों की अपेक्षा उन्हें किफायती और पारिवारिक सदस्यों के साथ संक्रमण मुक्त नजर आया। सुविधााजनक यात्रा के लिये धीरे -धीरे उन्होनें ५ दिनों में यह तकरीबन १५०० किलोमीटर का लंबा सफर तय किये।




Good