सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के अन्तर्गत घर-घर में शौचालय बनाने की मुहिम चलाई है, जिसे लेकर काफी अभियान भी चल रहा है। इसी बीच उत्तर प्रदेश के जिले व गांव खुले में शौच से मुक्त होने का प्रमाणपत्र भी पा चुके है लेकिन यह केवल सरकार और जनता को मूर्ख बनाने के अलावा कुछ नही है।
जगजाहिर है कि आज भी कही-कही शौचालय नही है, कही है तो उपयोग करने के काबिल नही है। कही है तो लोग जान बूझकर उपयोग नही कर रहे है। इस अभियान में पहले गंगा के किनारे के गांवों पर सरकार की निगाह थी, जोकि अधिकारियों ने केवल कागज पर जिले और गांवों को ओडीएफ घोषित कराकर झूठी आंकडे़बाजी से केवल धोखा किया है। गांव के लोग बाहर खेतों में शौच के लिए जाते है। इसमें कुछ लोग तो गलत करते है लेकिन कुछ लोग अधिकारियों और सिस्टम की लापरवाही से आज भी बाहर शौच को मजबूर हैं।
भदोही जिले के डीघ ब्लाक अंतर्गत सेमराध में एक मामला प्रकाश में आया है, जहां सेमराध कई वर्ष पहले ही खुले से शौच मुक्त हो गया लेकिन आज भी कुछ ऐसे लोग है, जिनको शौचालय नसीब न हुआ। ग्राम, ब्लाक, जिलास्तर के जिम्मेदार अधिकारी केवल सरकार को झूठी रिपोर्ट बनाकर भेजते रहे और जनता के साथ-साथ सरकार को भी गुमराह करते रहे। इन सबके पीछे केवल लापरवाही व भ्रष्टाचार है। जिले में इसकी चर्चा भी हर गांवों में सुनी गई। कुछ मामले तो ऐसे भी देखे गये कि अधिकारी अपने नाम और नौकरी के लिए ग्राम प्रधानों को बलि का बकरा बनाकर उनके गांवों को ओडीएफ घोषित करा दिया। इसकी वजह यह थी कि भ्रष्ट अधिकारी जब शासन के मंशानुरूप कार्य न करा सके तो, ग्राम प्रधानों पर दबाव बनाकर केवल खानापुर्ति में जुटे रहे। जिले में बने शौचालयों की गुणवत्ता और उपयोगिता सबके सामने है। मालूम हो कि सेमराध निवासी महेश गौड़ की विधवा ऊषा गौड को स्थानीय जिम्मेदार लोगों ने शौचालयघर नही दिया और सेमराध को ओडीएफ घोषित कर दिया। कई वर्षो के इंतजार के बाद विधवा ऊषा के सब्र का बांध टूटा और अपनी शिकायत मुख्यमंत्री पोर्टल पर कर दी। शिकायत की सूचना मिलते ही अधिकारियों के कान खडे़ हो गये कि सेमराध तो ओडीएफ घोषित हो गया है। फिर अभी यह कहां से बच गई है..? और बेचारे लाॅकडाऊन में भी अपनी खुलती पोल को ढ़कने का प्रयास करने लगे। लेकिन जिलास्तर पर जुडे़ इस मिशन के लोग बखूबी जानते है कि कितनी ईमानदारी से कार्य किया गया है.? हालांकि आनन-फानन में डीघ ब्लाक के बीडीओ ने ग्राम प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी को सूचित करके ऊषा देवी से मिलकर शौचालय घर की सूची में नाम डालने का आश्वासन दिया। और मामले को शांत करने की जुगत में दिखे। लेकिन यहां सवाल बनता है कि जब पुरा गांव ओडीएफ तो ऊषा केसे बच गई.? क्या ऊषा को शौचालय की जरूरत नही थी.? या ऊषा गांव में नही रह रही थी.? किस आधार पर घोषित किया गया गांव को ओडीएफ.? क्या जिलास्तर के जिम्मेदार लोगों का ऐसा ही है ओडीएफ? इसी तरह के न जाने कितने सवाल लोगों के दिमाग में घुम रहे है। फिर भी शायद जिम्मेदार लोगों को कई फर्क नही पड़ता है। उनको सरकार के आदेशों की धज्जियां उड़ाने और जनता को मुर्ख बनाने में थोड़ा सा भी समय नही लगता है।



