कुछ वर्षों पूर्व में महाराष्ट्र की सत्ता कांग्रेस के हाथों में थी और तत्कालीन गुरूदास कामत व कोषाध्यक्ष अमरजीत मन्हास की जोड़ी ने तो एक दशक पूर्व मुंबई की सभी लोकसभा सीटों से भाजपा-शिवसेना का सुपड़ा साफ कर दिया था। फिर भी ऐ सिंहासन कहां स्थिर रहता है।
परिणाम समक्ष है कि कांग्रेस की कमर इस कदर टूट चुकी है कि वह विपक्ष की भूमिका भी निभा पाने में सफल नहीं हो पा रही है। इतने पर भी उसके कार्यकर्ता कई गुट में विभाजित हो गए है, जिसके कारण कांग्रेस उभर भी नही पा रही है। आपसी मतभेद व खींचातानी में ही कांग्रेस की लुटिया डूबती चली जा रही है। आज हालत यह है कि उसके पास ऐसे मजबूत हाथ भी नहीं बचे हैं, जो कांग्रेस को एक बार फिर से सम्मान की स्थिति में ला सकें। इसी तरह के हालात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भी हो चुके हैं। इनके पास भी कोई मजबूत नेतृत्व नहीं रह गया है जोकि एनसीपी की डूबती लुटिया को बचा सके। अब जब चुनाव का भोंपू बज गया तो सभी ने अपनी-अपनी कमर कस ली है और एक दूसरे पर छींटाकशी करना प्रारंभ कर दिया है। ऐसे में चाहे कोई छूटभैया नेता हो या कोई बड़े पदों पर विराजमान नेता हो…सभी गुलाटिया खाना शुरू कर दिए और एक बार फिर लोगों के बीच पहुंचकर उन्हें तरह-तरह के लुभावने प्रलोभन देने शुरू कर दिए हैं। भाजपा के बारे में तो यह कहा जा रहा है कि इनके उम्मीदवार खुद के बल पर नही अपितु पीएम मोदी के नाम पर चुनाव जीत कर आते है। आजकल मुंबई की बात करे या फिर कल्याण-डोम्बिवली की बात करे सभी जगह राजनीतिक सरगर्मी शुरू हो गयी। इन चुनावों में खास बात तो यह रहती है कि उत्तरभारतीय मतदाताओ को रिझाने के लिए भी तरह तरह के हथकंडे अपनाए जाते है।



