सुनील तिवारी..✒️
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की आज शुक्रवार को प्रथम पुण्यतिथि है. पिछले वर्ष 16 अगस्त की शाम ने देश के प्रखर कवि-वक्ता और महान नेता को हमसे छीन लिया. उनका व्यक्तित्व इतना विशाल था कि विपक्षी भी उनके मुरीद थे. जगजाहिर है कि भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी बेहद नम्र इंसान थे और वह अंहकार से कोसों दूर थे. पिछले साल उनके निधन पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी वाजपेयी के बारे में कहा था कि ‘पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी में अहंकार बिल्कुल भी नहीं था और मैं उन्हीं से प्रेरित होकर विनम्रता को आत्मसात करने का प्रयास करता रहता हूं.’
खैर..बतौर कलमकार हमें याद है कि ‘फील गुड’ के नारे के साथ इस जनतंत्र ने उन्हें पुनः प्रधानमंत्री हेतु स्थापित नहीं किया लेकिन उसके पीछे भी कई कारण थे और कई अटल निर्णय भी दूरदर्शिता पथमय उन्होंने नि:स्वार्थ लिया था। आज अटल बिहारी वाजपेयी की याद आई तो उनकी काव्य रचना जहंन में घुमनें लगी क्योंकि ‘जहां ना पहुंचे ‘रवि’, वहां पहुंचे ‘कवि’। ऐसा पढ़ता आया लेकिन निष्पक्ष लेखनी के विधाता को आज नमन करता हूं और उनकी यह रचना वर्तमान परिस्थिति में भी हृदयतल में बहुत कुछ रेखांकित कर रही है..
कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है।
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है।
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है।
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है।
बिना कृष्ण के आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है।


