‘परदेशी’ तो ‘हेहर’ हैं भाईसाहब, चंदा देकर ‘मानवता’ पथ चलते रहेगें.!!😀
कोरोना की महामारी में सबसे ज्यादा त्रस्त शहर बैठे परदेशी हैं, वही परदेशी जो खून-पसीने की कमाई से गांव-समाज को सींचते रहते हैं। गांव-समाज के कुछ लोग भी उन्हें ‘बकरा’ समझकर ‘हलाल’ करने में पीछे नहीं रहते हैं। आखिर पीछे रहें भी क्यों.? जब बकरा हलाल होने आया है तो….फिर भी एक परदेशी गांव-समाज के…


