उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत चुनाव होने जा रहा है. ऐसे में बहुत से सक्षम इच्छुक ऐसे भी हैं, जो हार के डर से अपनी इच्छा को दफन कर देते हैं, जबकि उनके गांव में ही कई बार चुनाव हारकर भी डटे हुए प्रत्याशी उपलब्ध हैं. खैर..ऐसे ‘हारेला’ प्रत्याशियों को सम्मान से ‘धरती पकड़’ कहा जाता है. देश की राजनीति में जौहर दिखाकर स्वर्णिम अच्छरों से अपना नाम दर्ज करवा गए, जोगिन्द्र सिंह ‘काका’ का रिकार्ड आपको हौसला देगा लेकिन बतौर प्रत्याशी ‘हमें वोट मत देना’ का नारा बुलंद करने का ‘कलेजा’ भी आपके पास होना चाहिए..✍️
‘काका’ पैदल या साइकिल पर निकलते थे और लोगों से कहते फिरते थे कि “मैं चुनाव में खड़ा हूं, मगर मेहरबानी करके मुझे वोट न देना।” चुनाव लड़ने और फिर हारने की अपील के पीछे ‘काका’ की सोच कुछ अलग ही थी। काका जोगिंद्र सिंह वैसे तो संयुक्त हिंदुस्तान के गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में 1918 पैदा हुए थे। लेकिन बंटवारे के बाद ‘काका’ परिवार समेत उत्तर प्रदेश के बरेली में बस गए। उसके बाद काका जोगिंद्र सिंह ने 1962 से हर चुनाव में खडे़ होने की ठान ली। उन्होंने विभिन्न राज्यों की कई सीटों से करीब 300 बार चुनाव के लिए नामांकन भरा था। अपनी इसी आदत की वजह से ‘काका’ इतने प्रख्यात हुए कि एक बार तो देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी ‘काका’ को उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में बतौर सिख चेहरा मैदान में उतरने को कहा था। लेकिन ‘काका’ ने यह प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए किसी भी राजनीतिक पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था। ‘काका’ हमेशा आजाद प्रत्याशी ही एक ही चुनाव में कई-कई सीट से नामांकन भरते थे। सन् 1998 में काका का निधन हो चुका है लेकिन उनके नाम दर्ज रिकार्ड के करीब कोई ‘धरती पकड़’ प्रत्याशी अभी तक भटक नहीं पाया है।



