यूं तो ‘सियासत’ में पूर्वांचल का उन्हें ‘बाहूबली’ कहा जाता है लेकिन ‘हैट्रिकपार विधायकी’ का जोश जब ‘मोदी लहर’ भेंदकर जनता ने दिया तो खुद को ‘जनबली’ कहने लगे. शान से कहते हैं कि बाहूबल का पता नहीं लेकिन हमारे पास जनबल है और जनता की सेवा-सुविधा खातिर सत्ता-शासन से भी टकरा सकता हूं..आप तो समझ ग़ए होगें क्योंकि वो ललकार के कहते हैं कि ‘माफियाओं की सियासी चाल समझता हूं और विजय मिश्रा नौकर है तो सिर्फ भदोही की जनता का। अब समझ गए होगें की चर्चा किस बाहूबली विधायक की हो रही है..✍️
जी हां…भदोही जनपद की जनता के बीच खंगाला जाय तो विधायक विजय मिश्र को चाहने वाला की संख्या ज्यादा है, जिसमें सभी जाति-धर्म के लोगों का समावेश है. कमोवेश गरीब जहां विभिन्न समस्याओं के समस्त के निस्तारण के लिए खुश रहते हैं, वहीं मध्यम वर्गीय विकास कार्य से. कुछ धन्नासेठों व सियासतबाजों से भिड़ंत भी जोरदार करने में विजय मिश्र आगे रहते हैं और शॅह-मात के खेल में भी पीछड़ते नहीं तो, युवावीर इस लड़ाका विधायक को पसंद करते हैं. जगजाहिर है कि भदोही की सियासत में फर्जी आरोप एफआईआर का कभी ऊल्लू इस काठ भी बैठता है. यह भी दिलचस्पी से जनता परखती रहती है, हालांकि देर-सबेर फैसला भी होता है तो न्याय मंदिर से. इन दिनों बताया जाता है कि सियासत में फिर मुकदमों से घिरे विजय मिश्र आगरा जेल में हैं।
कोरोना संघर्ष – पिछले वर्ष जब पहली बार कोरोना की लहर से लाॅकडाऊन हुआ तो भदोही की ज्ञानपुर सीट से विधायक विजय मिश्र पत्नी रामलली और बेटे विष्णु सहित समर्थकों सहित कूद पड़े थे. उस समय चरमराई व्यवस्था में जरूरतमंदों को प्रतिदिन घरपोच ५००० टिफिन कई दिनों तक देने के बाद भी कई कुंतल अनाज वगैरह उनके बेटे तहसीलदार कार्यालय तक पहुंचा आए थे. विधायक की विशेष गुहार पर शासनिक अमले ने भी द्वार-द्वार पहुंचकर राशन कार्ड सिर्फ १५ दिन बड़े पैमाने पर बनाया था, ताकि जरूरतमंदों को निरंतर सरकारी खाद्यान्न मिले. इतना ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य सेवा हेतु बुनियादी मास्क, सेनिटाईजर व दवाइयों हेतु विधायक नीधि से २१ लाख रूपए त्वरित व्यवस्था किया था, जबकि उक्त फरवरी-मार्च में ही उनकी विधायक नीधि जनसेवा सुविधा-संशोधनों में खर्च हो चुकी थी।
क्यों खल रही कमी – बताया जाता है कि गंभीर बिमारी से पीड़ित लोगों की विधायक नीधि से लाखों रुपए मदद करने में विजय मिश्र भदोही ही नहीं अपितु पुर्वांचल में टाॅप पर हैं. जनता की सेवा में वह निरंतर धनापुर आवास पर डेरा जमाए रहते हैं. क्षेत्रीय लोग बताते हैं कि उनके आवास पर कोई दुखीहारी पहुंचा तो नीजीतौर आर्थिक मदद करने के साथ शासनिक-प्रशासनिक अधिकारियों से भी उसके लिए आग्रह कर देते थे. बीएचयू सहित बड़े-बड़े अस्पतालों में भी पीड़ित के इलाज के लिए घंटी बजा देते थे।