उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों की तरह भदोही में भी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव नजदीक आते ही वर्तमान व पूर्व प्रधान सहित अन्य नए दावेदारों ने मंदिरों पर जाना शुरू कर दिया है. वहीं सुबह-शाम दावेदारों का मतदाताओं के दरवाजे पर दस्तक देना भी शुरू हो गया है. यही हाल औराई विकासखंड अंतर्गत समस्त ग्राम सभा पंचायतों में भी देखने को मिल रहा है, यहां भी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का समय नजदीक आते ही सभी दावेदार अपनी-अपनी गोट्टी बिछाने में लग गए हैं।
वर्तमान व पूर्व में रह चुके प्रधान अब मंदिर में पहुंचकर प्रार्थना एवं भगवान का दर्शन करना शुरू कर दिए हैं. जबकि वहीं दूसरी तरफ गांव की दुर्दशा पर मतदाता अपने भाग्य को पछता रहा है. ग्राम पंचायत के प्रधानों ने कार्यकाल को पूरा कर लिया है लेकिन वह तमाम गांव की स्थिति आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है. शासन द्वारा ग्राम पंचायत के विकास के लिए लाखों रुपए ग्राम पंचायतों को दिए गए, जिससे ग्राम पंचायत का चौमुखी विकास हो सके. किंतु विकास के लिए आई राशि तो खत्म हो गई लेकिन गांव का विकास नहीं हो सका और रास्ते, नाले, वैसे ही बीमारियों में संजीवनी फूंक रहे हैं. कई ग्राम सभाओं में देखने को मिलता है कि प्रधानों ने लोगों की समस्याओं पर कम अपने विकास पर जी-जान लगाकर रात दिन कड़ी मेहनत किया और खूब फले-फूले।
कहीं प्रधान के बेटे, तो कहीं देवर की हूँकूमत, बेरोजगारी में भी लाखों की प्रापर्टी डील.?
जहां पंचायत चुनाव में आरक्षण देकर निर्वाचन आयोग ने महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर उनको प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया है कि महिलाएं भी समाज में आगे बढ़ें. फिर भी चुनाव जीतकर आई अधिकांश महिलाएं घूंघट में ही रहती है और उनके पति प्रतिनिधि बनकर कार्य करते हैं. हर पंचायत चुनाव के बाद दिखाई देता है कि महिलाओं को ढ़ाल बनाकर पंचायत चुनाव जितने वाले ठप्पा-मोहर जेब में रखकर चलते हैं. खैर..अबकी फिर से महिलाओं की आड़ से परधानी की तैयारी दिख रही तो, यह कोई नई बात नहीं है. मतदाताओं की चेतना जब तक नहीं जागेगी, तब तक यूं ही भगवान भरोसे प्रधान और विकास अमलीजामा पहनते रहेगें।






