देश में महामारी के दस्तक देने के बाद से सरकार ने मानों राजकोष में हुए घाटे को जुर्माने से ही भरना तय कर लिया हो। पूर्णबंदी के दौरान की बात हो या मौजूदा समय की, जिधर भी नजर डाली जाए, कहीं मास्क ना लगाने का चालान, तो कहीं-कहीं गाड़ी पर भारी-भरकम जुर्माना। एक गरीब अपने परिवार के व्यक्ति को दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने में सुबह से शाम हो जाती है। वहीं जरा धोखे से भी मास्क और हेलमेट चेहरे से गायब मिला और पकड़ा गया तो उसे भारी-भरकम जुर्माना कर दिया जाता है।
सवाल यह है कि जिसने मुश्किल से पांच सौ रुपए कमाए हों, वह हजारों रुपए कहां से देगा.? सरकार को अगर लोगों को मास्क पहनने हेलमेट लगाने और सामाजिक दूरी को बनाए रखने के लिए मजबूर करना है, तो इसके लिए जुर्माना तय कर देने से कुछ बड़ा बदलाव नहीं देखने को मिलेगा। सरकार खुद यह तय करे कि उसे क्या करना है। इतने सारे नेता और मंत्री मास्क हेलमेट और सामाजिक दूरी का पालन नहीं करते दिखते हैं, लेकिन किसका चालान कटा.? जो लोग सड़क पर आम लोगों को जुर्माना देने पर मजबूर करते हैं, वे बिना मास्क वाले नेताओं के सुरक्षाकर्मी के रूप में देखे जाते हैं। कानून बनाने वाले तो मानो इससे परे हैं.! हमेशा तलवार गरीब, बेसहारा और रोजमर्रा के काम में लगे कामगारों पर ही गिरती है। हर मर्ज की दवा जुर्माना नहीं होती। सरकार अगर सच में सरकार चाहती है कि उसके प्रदेश और केंद्र शासित प्रदेश का नागरिक सुरक्षित रहे, तो उसे जागरूक करे।
‘सुशासन‘ में धृतराष्ट्र ‘प्रशासन‘ – यूपी में भले ही सुशासन का ढ़ोल पिटा जाय लेकिन धृतराष्ट्र प्रशासन की मजबूरी आए दिनों झलकती रही है. अभी पिछले दिनों ही यूपी का भदोही जिला भी सुर्खियों में छाया था. जहां नेता-मंत्री सार्वजनिक मंच पर मास्क हटा पान चबानें लगे, वहीं डीएम-एसपी सुशासन के परिदृश्य में मास्क लगाए मौन रहे. खैर सत्तादल के नेता-मंत्री थे तो चालान भी कैसे कटता।



