सत्ता के गलियारों से इन दिनों अपराधियों पर सख्ती के नाम रासुका की सौगात जमकर उत्तर प्रदेश में बंट रही है. भले ही रासुका ठोकवानें में माहिर यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ की चर्चा हो लेकिन इससे पहले मध्य प्रदेश से पिछड़ गए थे. अबकी यूपी रासुका कार्यवाही में टाॅप करेगा क्या.? यह तथ्यों व आकड़ो के आकलन पर पड़ताल का विषय है।
उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए की कड़ी धाराओं का सबसे ज्यादा इस्तेमाल इस साल गोकशी के मामलों में हुआ है. पिछले दिनों राज्य के अपर मुख्य सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी द्वारा जारी आकड़े पर गौर करें तो “पिछले आठ महीनों में यानी अगस्त तक यूपी पुलिस ने राज्य में 139 लोगों के खिलाफ एनएसए लगाया है, जिनमें से 76 मामले गोहत्या से जुड़े हैं. बरेली जोन में 44 लोगों के खिलाफ एनएसए के तहत मामला दर्ज किया गया है. 37 लोगों पर जघन्य अपराधों के लिए जबकि महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराध के मामलों में अब तक छह लोगों पर एनएसए लगाया गया है.” उक्त आकड़े जारी करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि लोक व्यवस्था पर बुरा असर डालने वाले अपराधियों के खिलाफ रासुका की कार्रवाई की जाए ताकि अराजक तत्वों और बदमाशों के बीच कानून का डर व्याप्त हो और आम जनता के बीच सुरक्षा की भावना पैदा हो।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा वर्ष 2018 की नवीनतम प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, सभी राज्यों में से मध्य प्रदेश में वर्ष 2017 और वर्ष 2018 में रासुका के तहत सबसे अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया और उसके बाद उत्तर प्रदेश का स्थान आता है। वर्ष 2018 में, देश भर में रासुका के तहत 697 लोगों को हिरासत में लिया गया, जिसमें से 406 को समीक्षा बोर्डों द्वारा रिहा किया गया, जबकि 291 हिरासत में हैं। इसी तरह ताजा सरकारी आकड़े के मुताबिक मध्य प्रदेश में जहां वर्ष 2017 और वर्ष 2018 में एनएसए के तहत 795 लोगों को हिरासत में लिया गया था, जिसमें समीक्षा बोर्डों द्वारा 466 लोगों को रिहा किया गया जबकि 329 हिरासत में हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 और वर्ष 2018 के दौरान रासुका के तहत 338 लोगों को हिरासत में लिया गया, जिसमें से समीक्षा बोर्ड द्वारा 150 लोगों को रिहा कर दिया गया, जबकि 188 हिरासत में हैं।
क्या है रासुका – रासुका यानी एनएसए के तहत किसी भी व्यक्ति को 12 महीने तक बिना किसी आरोप के हिरासत में रखा जा सकता है. हालांकि इसके लिए प्रशासन को यह बताना होता है कि वह व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा या कानून व्यवस्था के लिए खतरा साबित हो सकता है. तीन महीने से ज्यादा समय तक जेल में रखने के लिए सलाहकार बोर्ड की मंजूरी लेनी पड़ती है. इस सलाहकार बोर्ड में हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज भी शामिल होते हैं।



