मुंबई की गलियों में हिन्दी पत्रकारिता का भीष्मपितामह अजय भट्टाचार्य को यूं ही नहीं कहा जाता है बल्कि बालासाहब ठाकरे के दौर में हिंदी दैनिक ‘दोपहर का सामना’ के बाद ‘नवभारत’ जैसे सुप्रसिद्ध अखबारों में संपादकीय विभाग को अग्रलेख के सरोकार से जोड़ा. ‘सरल गीता’ के रचयिता एवम् वर्तमान में ‘भजन-कीर्तन’ के संपादक अजय भट्टाचार्य के लेख अभी भी देश के सुप्रसिद्ध अखबारों में छाए रहते हैं. ऐसे में ‘पापराजी पत्रकारिता के दौर’ की चर्चा भी कर बैठे हैं तो, यह लेख जरूर पढ़िए….
देश बहुत बदल गया है। 2014 से पहले देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसे तमाम मुद्दे थे जिन पर बहस और चर्चा होती रहती थी। अब न भ्रष्टाचार है, न गरीबी, न बेरोजगारी, न स्वास्थ्य, न महंगाई और न सुरक्षा की कोई चिंता है। आर्थिक स्थिति भले 23.90 प्रतिशत ऋणात्मक हो देश संपन्नता से लहलहा रहा है और देश का मुखिया अंगने में मोर नचा रहा है। कोरोना रोज सुरसा के मुंह की तरह तेजी से बढ़ रहा है मगर मजाल है कि मीडिया को यह सब दिखाई पड़े। अरे मीडिया को तो उप्र में अपने हमपेशा पत्रकारों की हत्याओं और उत्पीड़न भी नहीं दिखता। इन दिनों सबसे बड़ी राष्ट्रीय चिंता का विषय सुशांत सिंह राजपूत की मौत की गुत्थी सुलझाना है।
गोपालगंज में हुए तिहरे हत्याकांड के छींटे सत्ता प्रतिष्ठान तक गिरे होने के बावजूद मीडिया को नहीं दिखाई पड़ते। कोरोना से ज्यादा लोग अब भी टीबी से (प्रतिदिन औसतन 3000 लोग) मर रहे हैं, कोई चर्चा सुनी कहीं? अगर नहीं तो आप मान लीजिये कि हम पत्रकारिता के पापराजी दौर में आकर खड़े हो गये हैं, जिसमें व्यक्ति विशेष की निजी जिंदगी में जबरदस्ती घुसकर सनसनी को खबर बनाकर परोसना ही पत्रकारिता है। पापराजी की इसी प्रवृत्ति पर पिछले सप्ताह सुशांत सिंह आत्महत्या प्रकरण में एक लम्बे इंतज़ार के बाद प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का बयान भी आया। काउंसिल ने कहा कि मीडिया को जांच के तहत मामलों को कवर करने में पत्रकारिता के आचरण के मानदंडों का पालन करना चाहिए और सलाह दी जाती है कि अपना ‘समानांतर परीक्षण’ न करें।
हालांकि इससे पहले करीब अढ़ाई महीने से मीडिया इस मामले को लेकर अपनी ट्रायल जारी रखे हुए है और इस सलाह के बाद भी वह बदस्तूर जारी रही। प्रेस काउंसिल की सलाह की परवाह किसे है? इतालवी भाषा के शब्द पापराजी को पश्चिमी देशों में उन स्वतन्त्र फोटोग्राफरों के लिए प्रयोग किया जाता है जो समाज/देश/दुनिया में प्रसिद्द हस्तियों का पीछा कर उनके निजी दैनिक जीवन के ऐसे लम्हों को अपने कैमरे में सुरक्षित कर लेते हैं जो देखने वालों के लिए अत्याधिक रोचक और सनसनी से भर दें। ब्रिटेन की राजकुमारी डायना और उनके प्रेमी डोडी को ऐसे ही पापराजी पत्रकारों से बचकर भागने के प्रयास में 23 साल पहले 31 अगस्त 1997 को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इन दिनों मुंबई की सडकों पर सुशांत मामले में सीबीआई की सुनवाई का सामना कर रही अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के पीछे देशी पापराजियों की फ़ौज को देखकर क्या लगता है? यह ठीक है कि रिया और डायना की तुलना बेमानी है लेकिन जब पत्रकारिता के स्तर की बात होगी तो जो नजर आ रहा है उसे पत्रकारिता तो नहीं कहा जा सकता। मजेदार और विरोधाभासी बात यह है कि हर चैनल के पास अपनी सबसे अलग “सच्ची” कहानी है। ऐसा लगता नहीं बल्कि पूरी तरह महसूस होता है जैसे हर चैनल को कहीं से हर रोज अलग-अलग पटकथा की प्रस्तावना मिल जाती हो और फिर दिन भर उस प्रस्तावना का विस्तार खबरों की जलेबियाँ बनाकर पेश किया जा रहा है। सड़क पर जितनी भीड़ पापराजी की है उससे कहीं विद्रूप स्थिति स्टूडियो में है। हिंदू-मुस्लिम, चीन, पाकिस्तान, मंदिर-मस्जिद बहस के स्थाई मुद्दे बन गये हैं जिनके बीच सुशांत सिंह राजपूत जैसे लोगों की मौत तडके का काम करती है। कुछेक चैनलों पर प्रस्तोता यानि एंकर बस कमीज के बटन नहीं तोड़ते, बाकी पागलपन में कोई कमी नहीं है। पत्रकारिता के इस दौर में वह आदमी जिसकी आखिरी उम्मीद ही पत्रकार और पत्रकारिता पर टिकी है, वह क्रमश: शनै: शनै: टूट रही है। इसलिए टीकमगढ़ में पांच लोगों के परिवार की सामूहिक आत्महत्या की खबर देश की मीडिया में गायब हो जाती है अलबत्ता मोर को दाना चुगाते प्रधानमंत्री की लघु फिल्म जरूर चर्चा में आ जाती है। सब चंगा सी की जिस मुद्रा को अधिकांश मीडिया ने अपना लिया है यह देश के लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए घातक है।


