उत्तर प्रदेश के पुर्वांचल में ड्रग माफियाओं का कारोबार वर्षों से तरक्की कर रहा है लेकिन उच्च शासनिक-प्रशासनिक अधिकारियों के साथ स्वास्थ्य विभाग की टीमें भी मौन हैं। फिलहाल भदोही जनपद में कोरोना संकट के दौरान फार्मासिस्ट के घर से मिली लाखों की सरकारी दवाईंयों व इलाज सामग्री का मामला सलटानें का प्रयास चल रहा है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों में ‘झोलाछाप डाक्टरों’ तक यह सरकारी दवाईयां कैसे पहुंचती है, शायद ही इसका खुलासा हो पाये।
गौरतलब है कि भदोही जनपद के विभिन्न गांवों में बिना लाइसेंस मेडिकल स्टोर धड़ल्ले से चल रहे हैं, जहां कई मेडिकल संचालक 10-12वीं फेल होने के बाद डाक्टरी पेशे से भी जुड़े हैं। इसी के साथ कई मेडिकल ऐसे हैं जो स्थानीय ‘झोलाछाप डाक्टरों’ को मलाईदार यांनि ज्यादा एमआरपी की दवाईंयों को मुहैया कराते हैं। ऐसी ही कुछ बेअसर दवाईंयों को एंटीबाईटिक ने नाम पर देकर मरीजों से दमदार कमाई की जाती है। खैर..भदोही जनपद के एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता आशीष दूबे की मानें तो पिछले कई वर्षों से सरकारी दवाईंयां व इंजेक्शन कई गांवों के झोलाछाप डाक्टरों तक पहुंच रही है।
हैरतअंगेज तथ्य तो यह है कि बिना डिग्री व लाइसेंस के इन तथाकथित डाक्टरों व मेडिकल स्टोरों पर स्वास्थ्य विभाग द्वारा कोई शिकंजा नहीं कसा जाता है। पुलिस विभाग का भी ध्यान इनकी शिनाख्त करने की तरफ नहीं है, जबकि किसी ‘बहरे’ से भी पूछ लें…तो भी स्थानीय गांव के तथाकथित झोलाछाप डाक्टरों की फेहरिस्त मिल जाएगी और ‘आंख’ बंद करके भी उक्त मेडिकल तक कोई भी पहुंचा देगा। आशीष दूबे आगे कहते हैं कि सुंदर पुर, मिल्की, देवाजीत पुर, पसढ़िया पुर सहित ज्ञानपुर ब्लाक के सुबास नगर, बिंद नगर सहित कई दर्जन गांव ऐसे हैं, जहां खुलेआमं सरकारी दवाईयों के ‘झोल’ के दम पर ‘झोलाछाप डाक्टर’ चमके हैं।
विश्वत सुत्र बताते हैं कि कई सरकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में भले सन्नाटा पसरा हैं लेकिन उनके नाम पर सरकारी स्वास्थ्य कर्मचारियों की सेवाएं व दवाईंयां कागज पर जमकर जारी होती हैं, जिसे इन्हीं बिना लाइसेंसी मेडिकल स्टोरों व झोलाछाप डाक्टरों को बेचा जाता है। उच्च शासनिक-प्रशासनिक अधिकारियों की उदासीनता से सरकार भले ही लाख दावे करे लेकिन मानवता के स्वास्थ्य मुद्दे पर जिला प्रशासन की सतर्कता मुहिम खुद मौन ग्रसित है।




