दिल को खटके,
जरा हटके…
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सुनिये हे विधायकजी, करिये ‘कुछ’ ऐसा काम
भाजपा की ‘छवि’ को, सदैव ना कीजै बदनाम
सदैव ‘ना’ कीजै बदनाम, आलोचक हैं कर्णधार
कभी तो ‘अब’ दहाड़िये, घर में देखो हैं ठेकेदार
कहे ‘बहुरूपीय’ मौन, झूठा भाषण यूं ना धुनिये
भ्रष्टाचार को जूता मार, नेताजी पंचनिष्ठा सुनिये
एस. टी. ‘बहुरूपीय’ (९३२४००६२६९) आपका व्यंग्यकार, आपकी आवाज..
(स्तंभ वर्ष – १२) – ’जन्मभूमि’ की ‘मिट्टी’ का ‘तिलक’ लगाता हूँ, हाँ…’झूट्ठों की नगरी’ में भी ‘सत्य नारायण’ कथा ‘सुनाता’ हूँ.!


