बिन बेटी सलाखों में १४ दिन तड़पती रही ऐ माँ, रिहाई बाद बोली ‘जेल में रहना गर्व की बात’…

५ दिनों तक मुझे घर के भी किसी सदस्य से नहीं मिलने दिया गया। अधिकारी कहते थे कि ऊपर से बहुत प्रेशर है। परिजन को गेट से ही वापस कर दिया गया। पति भी जेल में थे। मुझे पता चला कि पति या माता-पिता से शनिवार को 15 मिनट मुलाकात कर सकते हैं। शुक्रवार को जेलर को मैंने चिठ्ठी लिखी कि पति से मिलने दिया जाए, जिसे खारिज कर दिया गया। मेरे पति भी मुलाकात के लिए भूख हड़ताल पर बैठ गए थे। प्रेशर की वजह से शनिवार को जेलर ने अपने सामने 5 मिनट की मुलाकात कराई। अगले शनिवार को एप्लिकेशन स्वीकर कर ली गई और हम दोनों करीब 25 मिनट आराम से मिले। बेटी के बारे में भी बातें हुईं। 14 दिन में 2 बार पति से मुलाकात हुई…

उत्तर प्रदेश में नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार की गईं पर्यावरण एक्टिविस्ट एकता शेखर को 14 दिन बाद गुरुवार को जमानत मिली, जिसके बाद मीडिया की सुर्खियों में हैं। मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक एकता महमूरगंज स्थित घर पहुंचकर अपनी 14 माह की बेटी से मिलीं। एकता ने कहा कि 5 दिन तक मुझे किसी रिश्तेदार से मिलने नहीं दिया गया, जेल के अधिकारी ऊपर से प्रेशर होने की बात कहते थे। उन्होंने कहा कि बेटी की चिंता में एक-एक पल पहाड़ की तरह कटा।

19 दिसंबर को सुबह 10 बजे मैं और मेरे पति रवि शेखर घर से निकले थे। उस दिन अशफाक उल्लाह खान और राम प्रसाद बिस्मिल का शहादत दिवस था। कार्यक्रम बेनियाबाग में होना था। सभा में इस बात पर भी चर्चा होनी थी कि क्या संविधान और कानून से छेड़छाड़ की गई है? रैली और जनसभा से पहले पुलिस ने नाकाबंदी कर रखी थी। हम लोग गलियों से होकर रैली में पहुंचे,तभी रास्ते में पुलिस नेहिरासत मेंले लिया। 12 बजे बस से हम सभी पुलिस लाइन आए और वहीं सभा की। रोजगार, दवाओं के दामों पर बात रखी गई। शाम को 6 बजे हम लोगों को पता चला कि हमें गिरफ्तार करजिला कारागार शिफ्ट किया जा रहा है। मुझे और मेरे पति को घर के भी बहुत काम करने थे। बच्ची का दूध और डाइपर लेना था। घर बता दिया कि जेल भेजा जाएगा। हमारे बड़े जेठ जेल के बाहर आ चुके थे। उनको सारी बातें बताकर हम दोनों अंदर चले गए।

जेल में अधिकारी, बंदी रक्षक हर सवाल का जवाब सहज तरीके से देते थे। उनका व्यवहार अच्छा रहा। बस वो ऊपर से प्रेशर की बात करते थे। जेल में खाने के लिए दो बार भूख हड़ताल की, हालांकि उन लोगों ने काफी सहयोग किया। मूली के पत्ते की सब्जी खाने में मिल रही थी। विरोध करने पर गोभी की सब्जी और अन्य चीजें खाने को मिलीं। पहले ही दिन से हमारे जेठ शशिकांत तिवारी ने वकील से बातचीत की और प्रॉसेस फॉलो किया। वे कोर्ट के बाहर सुबह से शाम तक रहे। उनकी मदद से हम रिहा हो पाए।

एक एक्टिविस्ट के तौर पर जेल में रहना गर्व की बात थी, पर बच्ची से दूर रहना मुश्किल भरा रहा। मां होने की वजह से बेटी की फिक्र में एक-एक पल पहाड़ की तरह कट रहा था। मेरी बच्ची मेरे दूध पर निर्भर है। अगर इसे वनवास का नाम दिया जा रहा हैतो यह बेहतर काम के लिए ही था। आज चंपक बेहद खुश है। खेल रही है। मानो सभी खुशियां मिल गईं।मां से उसकी बच्ची मिली, सभी का आशीर्वाद है।

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