👉भदोही कंठ (११) – प्रधानजी ‘पति’ बने ‘प्रधान’, पढ़िये ‘आदर्श कोतवाली’ आख्या रिपोर्ट…
उत्तर प्रदेश की सबसे प्रसिद्ध चाय है, यहां चाय मे चीनी कम बकैती का मिठास ज्यादा होता है। सुबह गाँव की दातुन से शुरु होकर दिल्ली के तख्ते तक यह चाय पहुंचा देती है। इस चाय का आनंद दुर-दराज प्रकृतिक की गोद मे बैठे गांव के बेरोजगार और रिटायर्ड लोग मिलकर इसमे गांव की चुगली से शुरू करके यही बैठे बैठे भारत की अर्थव्यवस्था, राजनीति, कुटनीति, तख्तोताज से सरकार बनाना बिगाड़ना,सरकारी महकमों को अपने ज्ञान व्यापिनी चक्षुओं से हिदायतें देने के साथ साथ अदरक, इलाची की महक वाली घोल बना देते है। यह चाय एक लिटर दुध मे आठ लिटर पानी भले मिलाकर बना हो लेकिन गांव की सड़क, खेत-खलिहान, पड़ोस के झगड़ों और कैसे पट्टीदार के तिकड़म वाली फंसाने के साथ कड़क चाय बनकर तैयार होती है। इसे पकाने वाली भट्टी से ज्यादा तो लोगों के जुबान की गर्मी से इसमें उबाल पे उबाल आता है जो इसे अच्छी तरह पका देती है। कुछ भी हो लेकिन इस नुक्कड़ की चाय का आनंद अभिभूत कर देने वाला होता है। कभी फुर्सत मिले तो पीकर देखें। (अनुपम दूबे)



