उत्तर प्रदेश के अधिकांश गांव में भष्टाचार ‘नागफनी’ की तरह फैल चुका है। ग्राम प्रधानों के भ्रष्टाचार की कहानी जनमानस की जुबां पर है। ‘धरती वीरों से खाली नहीं…की तर्ज पर एक से बढ़कर एक मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में शायद ही कोई गांव इस भ्रष्टाचार के नासूर से अछूता हो। जगजाहिर है कि शासनिक अधिकारियों की मिलीभगत या उनके संरक्षण से ही ग्राम प्रधान विकास कार्यों में लाखों की हेराफेरी करके मालामाल हुये हैं। इसके जिम्मेदार शासनिक अधिकारियों के साथ ग्राम पंचायत सदस्य भी हैं।

लोकतंत्र की मूल इकाई में ग्राम पंचायत के सदस्यों के पास कोई काम नहीं होता है। चुनाव के बाद इनकी भूमिका जहां ‘नगण्य’ हो जाती है, वहीं सदस्य भी अपनी भूमिका निभाने में ज्यादा रूचि नहीं रखते हैं। यदि देखा जाये तो अधिकांश क्षेत्रिय ग्राम पंचायतों में सदस्यों का कोई महत्व नहीं है और न ही सदस्य ग्राम पंचायतों में होने वाले क्रिया- कलापों में रूचि रखते हैं, क्योंकि कुछ ग्रामों में सदस्य कम पढ़े लिखे और कामकाजी है। जिन्हें यह भी नहीं पता कि ग्राम पंचायत में उनकी क्या भूमिका होती है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ग्राम पंचायतों में आबादी के आधार पर कम से कम 9 और अधिक से अधिक 15 की संख्या में सदस्य होते हैं। ग्राम पंचायत में छह समितियों का गठन कर इनकी भूमिका निर्धारित की गयी है।
६ समितियां – जल संसाधन समिति, स्वास्थ्य समिति, प्रशासनिक समिति, निर्माण समिति, विकास एवं नियोजन समिति का इन ६ समितियों में समावेश है। इन समितियों के अधिकारों के मुताबिक यदि हैड पंप लगाना हो तो उदाहरणार्थ जल संसाधन समिति के प्रस्ताव पर लगेगा, इसी प्रकार मिड-डे मील, मरम्मत आदि क्रिया-कलापों पर इनके प्रस्ताव और निगरानी सुनिश्चित की गयी है।
खुली बैठक – नियमानुसार ग्राम पंचायतों की बैठकें सार्वजनिक व अविवादित स्थल पर की जानी चाहिये। बैठकों का कार्यवृत पंजिका में दर्ज किया जाये। बैठकों में आय-व्यय का ब्यौरा प्रस्तुत किया जाये। कृषि उद्यान, वृक्षारोपण, शिक्षा, पल्स पोलियो, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, जल संरक्षण, तालाब निर्माण आदि विषयों पर चर्चा की जाये। इन बैठकों में ग्राम सभा के सभी बालिग व्यक्तियों को भाग लेने का अधिकार होता है।
मुद्देवार चर्चा व सत्यापन- इन बैठकों में आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से वितरित होने वाले पुष्टाहार, पोलियो खुराक आदि की चर्चा की जाये। पेंशन सत्यापन, हैंड पंप, सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत वितरित यूनीफार्म, पाठय पुस्तकें, विकलांग उपकरण, स्कूल भवन निर्माण अतिरिक्त कक्ष निर्माण आदि का सत्यापन किया जाना चाहिये।
शायद ही ये सब किसी ग्राम पंचायत में होता हो क्योंकि ग्राम पंचायतों के सदस्यों को इन सब बातों से मतलब कम होता है। ग्राम प्रधान ही सब कुछ अपने दिमाग से निबटाते है।


