राजनीति में विपक्ष को कमजोर करना ही किसी राजनेता का काम नहीं होता बल्कि अपनी पार्टी में भी अपने प्रतिद्वंद्वी के पर कतरने की कला भी उसे आनी चाहिए। फ़िलहाल पार्टी के टिकट आबंटन में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने अपने रास्ते का रोड़ा बनने की संभावना वाले दो नेताओं को घर बिठाने में सफलता प्राप्त कर ली है। विनोद तावड़े और एकनाथ खडसे को टिकट न देकर पार्टी फोरम पर अब फड़नवीस को अब भाजपा के भीतर से चुनौती मिले ऐसा लगता नहीं है। पहले खडसे को लें। 2014 के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री बनने की भरपूर कोशिश की थी क्योंकि उस समय पार्टी में वे सबसे ज्यादा अनुभवी विधायक थे। लगातार 6 बार विधायक चुने जाने वाले खडसे लावा पाटील समुदाय से आते है जो अन्य पिछड़ा वर्ग का बड़ा वोट बैंक है। टिकट कटने के बाद जैसे ही खडसे ने बगावती राग अलापा तुरंत उनकी बेटी को टिकट थमा दिया गया। फ़िलहाल सतह पर शांत नजर आ रही मुक्ताईनगर की राजनीति भीतर-भीतर उबल रही है। कभी विधान परिषद् में विपक्ष का मजबूत चेहरा रहे विनोद तावड़े 2014 के चुनाव अभियान के दौरान खुद को भावी मुख्यमंत्री की तरह पेश करने/करवाने से पीछे नहीं रहे। लेकिन जब दिल्लीशाही पर नागपुर से नकेल कसी गई, देवेंद्र फड़नवीस की किस्मत चमक चुकी थी। तब से फड़नवीस ने धीरे-धीरे अपने प्रतिद्वंद्वियों को आहिस्ता-आहिस्ता किनारे लगाना शुरू किया जिसमें वे सफल भी रहे हैं।
आहिस्ता-आहिस्ता, सफलता की ओर ‘निपटान कार्यक्रम’.!


