लाॅकडाऊन – कर्फ्यू के बाद घरों में बैठे अधिकांश कामकाजी लोग मेंटल डिसआॅर्डर से गुजर रहे हैं। जगजाहिर है कि अधिकांश समय कोरोना वायरस से जुड़ी बातें हो रही हैं। सोशल मीडिया भी कोरोना वायरस से भरा पड़ा है। मिडिया रिपोर्टस के मुताबिक सबसे अधिक चर्चा वायरल वीडियो को लेकर हो रही है। इसकी वजह से लोगों में डिप्रेशन और चिंता बढ़ रही है।
गौरतलब है कि जहां लोग मेंटल डिसऑर्डर से गुजर रहे हैं, वहीं डिप्रेशन के पुराने मरीजों का मर्ज बढ़ गया है। वे हर वक्त कोरोना वायरस से अनहोनी की आशंका जता रहे हैं। ऐसे में लोग मनोचिकित्सकों से संपर्क कर रहे हैं।मनोचिकित्सक फोन पर लोगों की काउसिंलिंग करके स्ट्रेस फ्री रहने की सलाह दे रहे हैं। ज्यादातर मनोचिकित्सक लोगों को लगातार न्यूज व सोशल मीडिया पर बने रहने के बजाय इससे दूरी बनाकर रहने की सलाह दे रहे हैं। मनोचिकित्सक डॉ. हरप्रीत सिंह कहते हैं कि कुछ दिनों से टीवी व सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस को लेकर लगातार नेगेटिव बातें सामने आ रही हैं। बार-बार एक ही टॉपिक को देखने और सुनने पर लोगों के दिमाग पर असर हो रहा है। वाट्सएप पर भी तनाव पैदा करने वाले संदेश आ रह हैं। ऐसे में साधारण खांसी होने पर लोग तनाव ले रहे हैं। वायरस एक शारीरिक बीमारी है, लेकिन लगातार हो रही चर्चाएं इसे मानसिक बीमारी भी बना रही हैं। लोगों को लग रहा है कि उन्हें और उनके परिवार को कुछ हो न जाएं। ऐसे में वे लोगों को यही सलाह दे रहें कि खुद को सोशल मीडिया से दूर रखें। किताबें पढ़ें, योग और मेडिटेशन व प्राणायाम करें। लोगों को संगीत सुना चाहिए।
पाॅजीटिव रहिये – पॉजीटिव रहना बेहद जरूरी है। यदि आप पाॅजीटिव नहीं हैं तो बेफजूल की अन्य चर्चायें भी नकारात्मक असर छोड़ेगी। इससे छोटी-मोटी बातों पर चिड़चिड़ापन व गुस्सा बढ़ेगा। अगर मन में नेगेटिविटी रहेगी तो शरीर का इम्युनिटी सिस्टम कमजोर होगा। इम्युनिटी कमजोरी हुई, तो बीमारियों से लड़ना मुश्किल होगा।
डिप्रेशन व घबराहट से बचने के उपाय….
इस समय हरेक व्यक्ति एक गंभीर मनोदशा से गुजर रहा है। कोरोना वायरस से जुड़ी खबरें लोगों को मानसिक तौर पर बीमार बना रही है। बल्डप्रेशर के बिगड़ते संतुलन से इससे डिप्रेशन व घबराहट होने लगती है। ऐसे में मनोचिकित्सक यही सलाह दे रहे हैं कि कोरोना के बारे में जितना जानना था, सब जान चुके हैं। अब सोचना छोड़ें और घर पर रहकर अपनी पसंद की किताब पढ़ें। घरवालों के नजदीक रहें व सभी की भावनाओं को समझें क्योंकि इस क्षण में सकारात्मकता लुप्त होकर सभी चर्चायें नकारात्मकता की दहलीज पर खड़ी होगी। अभिभावकों को समय दें। प्रार्थना करें, जिन दोस्त रिश्तेदारों को भूल चुके हैं, उनसे फोन पर बात करें। पुरानी यादों को रिवाइज करिए। जिंदगी से जुड़े किस्से और अनुभव परिवार के साथ बांटने का यही समय है।



