महाराष्ट्र में चुनाव की घोषणा से पूर्व ही सियासी कसरत जारी थी लेकिन अब आगामी कुछ दिनों में तस्वीर स्पष्ट होने लगेगी। महाराष्ट्र में जब विधान सभा ‘चुनाव का भोंपू’ करीब आया तो अपने आरामदेह घरों से बाहर नेताजी लोगन को निकलना ही पड़ा। सड़कों पर दौड़कर मतदाताओं के बीच अपना पसीना बहाना मजबूरी ही है। वैसे कुछ महीनें पहले ही संसदीय चुनाव में तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर लोगों का दिल जीतने का भरसक प्रयास किये थे, परंतु जैसे ही चुनाव खत्म हुआ अधिकांश नेता ‘चकोर पंक्षी’ की तरह गायब हो गए थे। खैर..पितृपक्ष में ‘कौओं’ का बहुत महत्व है लेकिन अब चुनावी ‘कोओं’ ने भी ‘कांव-कांव’ करना शुरू कर दिया। आज हालात यह हो गए हैं कि यह नेतागण किसी भी तरह के छोटे-मोटे कार्यक्रम तक को भी नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं। फिलहाल ‘महाराष्ट्र चुनावी संग्राम’ 2019 की बात की जाय तो भाजपा हो, चाहे शिवसेना या फिर कांग्रेस अथवा राष्ट्रवादी कांग्रेस सभी अपने-अपने स्तर पर प्रचार प्रसार में रम गए हैं। कहीं ‘आशीर्वाद यात्रा’ निकाली जा रही है तो कहीं लोगों का साथ पाने के लिए कोई अन्य रैलियां। इस तरह से सभी अपने-अपने स्तर पर कार्य करने में रम गए हैं। यदि शिवसेना और भाजपा की युति के बारे में यह कहा जाए कि इनकी आपस में नहीं बनती। भाजपा भी तो अपनी पुश्तैनी हालत को भूलकर अब तानाशाही के अहंकार में मदमस्त है और शिवसेना स्वाभिमान से समझौता नहीं करती। भाजपा व शिवसेना की युति नहीं हो इसके लिये भी कसरत जारी है क्योंकि दोनों पार्टियों में चुनावी टिकट लेने वालों संख्या बढ़ गयी है। ऐसे में यदि समझौता होता भी है तो वह किस फार्मूले पर होगा…यह अनुमान लगा पाना संभव नहीं हो पा रहा है। जमीनी स्तर पदाधिकारियों का सामंजस्यपूर्ण दर्पण तो कभी-कभार ही नजर आता है।
‘चकोर पंक्षी’ की तरह थे लापता, अब लौटे हैं तो ‘कांव-कांव’.!


