नवी मुंबई : मदरहूड हॉस्पिटल खारघर में एक हाई रिस्क प्रेग्नेंसी का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत भ्रूण को कोख से हटाया और सतर्क प्रबंधन के साथ दूसरे जुड़वा बच्चे को बचाने के लिए प्रेग्नेंसी जारी रखी गई। किसी जुड़वा बच्चे में से एक की डिलीवरी या गर्भपात के बाद प्रेग्नेंसी जारी रखना बहुत ही दुर्लभ मामला है। गौरतलब है कि अतुल्यकालिक प्रसूति घटित होने का दर प्रत्येक 1000 शिशु जन्मों में 0.14 है। दुनिया में दो जुड़वों की सबसे लंबे अंतर में रिपोर्ट की गई डिलीवरी 111 दिन है। 36 वर्ष की श्रीमती प्रीति अय्यर, जिनके तीन प्रयत्न असफल होने का इतिहास रहा है । इसके बाद वो डाइकोरियोनिक (फ्रैटर्नल) जुड़वा बच्चों के साथ गर्भवती हो गई। 13 सप्ताह, 5 दिनों के गर्भकाल के बाद उनकी गर्भाशय ग्रीवा अंदर से खुलने लगी। इसलिए गर्भाशय ग्रीवा को बंद रखने में मदद के लिए उसे सीना पड़ा और दवाईयों और बिस्तर पर ही आराम करने की व्यवस्था की गई। ये सिलाई ढ़ीली पड़ने लगी और दो सप्ताह बाद उसे फिर मज़बूत किया गया। ग्रीवा की लंबाई और सिलाई की अखंडता के लिए मरीज़ पर बहुत बारीकी से निगरानी रखी गई। कुछ दिनों बाद 15 सप्ताह के गर्भकाल के बाद वो पेट में दर्द और योनि से रक्तस्त्राव की शिकायत के साथ अस्पताल में आई। इस बार उन्हें फिर सतर्क प्रबंधन पर रखा गया लेकिन इस बार उनके एक थैली से लीकेज होना शुरु हो गया। उन्हें असहनीय दर्द हो रहा था, जिससे उनकी सिलाई फट गई और एक जुड़वा शिशु बाहर आ गया। इसलिए , जुड़वा बच्चों के विकास और लिक्विड के मात्रा की जांच करने के लिए अल्ट्रा सोनोग्राफी (यूएसजी) की गई। यूएसजी में ये पता चला की एक भ्रूण (जुड़वा 1, निचला भ्रूण) में कोई भी गतिविधि नहीं थी और ह्रदय भी काम नहीं कर रहा था, जिससे एक जुड़वा की मृत्यु होने की पुष्टि हो गई। वो गर्भाशय के बाहर आ गया था। दूसरा जुड़वा सामान्य था और अच्छी तरह विकास कर रहा था। उनके पूरे परिवार के लिए ये निराश कर देने वाली और सदमा पहुंचानेवाली घटना थी। मदरहूड अस्पताल में कंसल्टेन्ट, ऑब्स्टेट्रीशियन और गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. अनु विज़ ने कहा, “उनके परिवार के साथ चर्चा करने के बाद ये फैसला लिया गया कि हम मृत जुड़वा बच्चे को हटाएंगे और गर्भाशय संबंधी गतिविधि के लिए अगले 24 घंटे निगरानी और इंतजार करेंगे। पहला जुड़वा बाहर निकल जाने के बाद गर्भाशय शांत था और यूएसजी में ये सामने आया कि दूसरा बच्चा अंदर अच्छी तरह विकसित हो रहा है। इसलिए फिर गर्भाशय ग्रीवा की सिलाई का फैसला लिया गया। मरीज़ ने 25 सप्ताह 6 दिनों तक गर्भावस्था जारी रखी, जिसके बाद उन्होंने अपरिपक्व शिशु को जन्म दिया जो 840 ग्राम का था और उसे आगे की देखभाल के लिए एनआईसीयू में शिफ्ट किया गया।” डॉ. विज़ ने आगे कहा, “ जुड़वा बच्चों की प्रेग्नेंसी हाई रिस्क वाली होती है और अक्सर अपरान्यास, मां की उम्र, मेडिकल समस्याएं, प्रासविक पेचीदगियों और जुड़वा बच्चों के विकास से जुड़ी चिंताओं संबंधी समस्याओं के चलते पेचीदा हो जाती हैं। जन्म से पहले एक जुड़वा की मौत हो जाने से दूसरे जुड़वा की जान को बड़ा खतरा होता है। बचनेवाला जुड़वा सेरिब्रल पाल्सी या मस्तिष्क संबंधी अन्य रोग से पीड़ित भी हो सकता है। इसलिए मां के पेट में पल रहे बच्चे को बचाने के लिए हमें अतिरिक्त देखभाल करनी पड़ी। ” मदरहूड अस्पताल में कंसल्टेंट पीडियाट्रिशियन और निओनैटोलॉजिस्ट डॉ. सुरेश बिराजदार ने कहा, “ जन्म के पहले तीन दिनों में ही शिशु को खास तौर पर स्तन का दूध देने से वजन वृद्धि में और रोग प्रतिकारक क्षमता बढ़ाने में मदद मिली। खास तौर पर स्तन के दूध के साथ स्टाफ द्वारा हाथों की सफाई का कड़ाई से पालन किया गया, जिससे शिशु को जानलेवा संक्रमणों से बचाने में मदद मिली। शिशु का वज़न अभी 1.7 किलो है। ” डॉ. विज़ ने आगे कहा, “अस्पताल में रखे जाने के दौरान मां को कंगारू देखभाल के लिए प्रशिक्षित किया गया, जोकि स्थिर किए जाने के बाद पहले कुछ दिनों तक बच्चों की देखभाल से संबंधित है। इसमें त्वचा से त्वचा के संपर्क के लिए बच्चे को मां की छाती पर रखा जाता है। ”.
क्या कहती हैं श्रीमती प्रीति अय्यर.. “मरे बच्चे और मुझे नया जीवन देने के लिए हम हॉस्पिटल और डॉक्टरों का धन्यवाद करना चाहते हैं। उनके समर्पित प्रयासों की वजह से मेरा बच्चा बच पाया और अब पूरी तरह तंदरुस्त है। मुझे अब मां होने पर गर्व है और मैं खुश हूं कि मेरा बच्चा मौत से बाल बाल बच गया और अब हम उस तरह की जिंदगी जी सकते है जिसका हमने हमेशा सपना देखा था।”
न्यूज ब्यूरो – प्रमोद कुमार..✍️


