यूपी में पंचायती चुनाव है, उसमें जिला पंचायत सदस्य व प्रधानी का पद हथियाने के लिए जोरदार संघर्ष होना लाजिमी है. सबसे खास बात यह भी हमेशा की तरह है कि सभी प्रत्याशी जीत भी रहे हैं. ऐसे में ‘धरती पकड़’ भावी ग्राम प्रधानों की चर्चा ना हो, तो मानिए लोकतंत्र अधूरा सा रह गया. ‘धरती पकड़’ ऐसे जज्बेदार प्रत्याशी होते हैं, जो बार-बार हार के बाद भी चुनावी मैदान में उत्साह के साथ डटे रहते हैं।
जगजाहिर है कि ऐसे प्रत्याशी गांव-गलियों में अधिकांश नजर आते हैं. जो हार के बाद हार, फिर भी डटे मैदान में. ऐसे में हर बार की तरह यदि बोले कि ‘अबकी जीत पक्की है’..तो आप आश्चर्य मत मानिएगा क्योंकि यह इन प्रत्याशियों का ‘रटंतू भौकाल’ होता है. लगी-लगी, नहीं तो दिल्लगी… की तर्ज पर एकाध प्रत्याशी तो अधिकांश गांवों में मिल जाएगें, जो ‘धरती पकड़’ की भूमिका में जीत का भौकाल टाईट रखते है। यूपी के बस्ती में 2017 में जब निकाय चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज हुई थी, तब तरह तरह के प्रत्याशियो के रंग में एक अनोखा रंगदार प्रत्याशी भी देखने को मिला था. वैसे तो हर सीट पर जो प्रत्याशी बेहतर लड़ाई में होता है उसका नाम लिया जाता है। पर जिले में एक ऐसे उम्मीदवार का नाम चर्चा में था, जो तब तक 12 बार चुनाव हार चुका था। उस दौरान 13 वीं बार चुनान मैदान में जीत की उम्मीद के साथ लोगों से वोट मांग रहे थे. जी हां…उस दौरान निर्दल उम्मीदवार के रूप में गोवर्धन सोनकर नाम सुर्खियों में था. वह एक ऐसे प्रत्याशी थे जो जनता के बीच एक दर्जन बार वोट मांगने के लिये गये लेकिन उन्हे सफलता नही मिली. गोवर्धन सोनकर सभी चुनाव मे अपना भाग्य आजमाते रहे मगर जनता उन्हें सिर आंखों पर नही बिठाती, जनता के लिये ये जनाब भले ही बेचारा प्रत्याशी थे लेकिन जनता का मूड गोवर्धन सोनकर बदल पाने मे हर बार नाकामयाब रहते, सिर्फ यही कहते कि जनता ही जनार्दन होती है। खैर..सबसे ज्याादा बार चुनाव हारनें की सूची मेें नाम दर्ज होना मामूली बात नहीं।